सुविचार अनमोल वचन Suvichar Anmol Vachan Good Thoughts

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Aaj ka rashifal or panchang 28-05-2020


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16 वे तीर्थंकर श्री शांतिनाथ भगवान का तप और मोक्ष कल्याणक दिन है


16वे तीर्थंकर, 5 वे चक्रवर्ती और 12 वे कामदेव ऐसे  तीन पद के धारी देवाधिदेव शांतिनाथ का गुरुवर, ज्येष्ठ कृष्णा चतुर्दशी, वी. सं.2546,दि.21 मई  2020  को जन्म, तप और मोक्ष कल्याणक दिन है । सभी धर्मप्रेमियों को हार्दिक बधाई और मंगल शुभकामनायें।

जानिए क्या कहा जैन मुनि शिवाचार्य जी ने lockdown 4 के बारे मे





श्रमण संघ जयवंत हो 
जय महावीर
॥ जय आत्म ॥ ॥ जय आनन्द ॥ ॥ जय देवेन्द्र ॥ ॥ जय ज्ञान॥ ॥ जय शिव आचार्य || 


आध्यात्मिक संदेश 


चातुर्मास हेतु वाहन विहार निषेध


आत्मार्थी साधु साध्वीवृंद एवं श्रावक श्राविकाओं से निवेदन हैं कि- चातुर्मास काल ज्यों-ज्यों नजदीक आ

रहा है अधिकांश साधु साध्वीओं को अपने पूर्व घोषित चातुर्मास स्थल की ओर बढ़ने की भावना हो रही है। वर्तमान
में कोरोना वायरस का प्रकोप जिस प्रकार चल रहा है उससे ऐसा लगता है कि यह लंबा चलेगा, फिर भी सबको
सावधानी रखना अनिवार्य है। भारत सरकार द्वारा जारी निर्देशों का पूर्ण पालन आवश्यक है।



अधिकांश साधु साध्वीयोंने सैकड़ों किलोमीटर के विहार का कार्यक्रम परिवर्तित किया है और वे अभी जहां

विराजमान है उसके आसपास के क्षेत्र में उन्होंने अपना चातुर्मास घोषित किया है। यह अभिनंदनीय है।
लॉकडाउन 4 के नियम शीघ्र ही हमारे सामने आने वाले हैं। सरकारी नियमों का पालन राज आज्ञा
है तथा संघ समाचारी का पालन देव आज्ञा है, दोनों का उल्लंघन करने वाला साधु साध्वी तीसरे महाव्रत में
दोष का भागी बनता है।



कुछ लोगों ने यह भ्रम फेलाया है कि वाहन विहार के बारे में आचार्य श्री जी का क्या कहना है?

क्या आचार्य श्री जी ने वाहन विहार की आज्ञा दी है?
आप सभी को सूचित किया जाता है कि - वाहन विहार की आज्ञा किसी को भी नहीं दी गई है,
अगर कोई चातुर्मास स्थल पर पहुँचने के लिए वाहन विहार करेगा तो उस पर उचित कार्यवाही होगी।
सभी साधु साध्वीयों को निवेदन है कि वे प्रवचन, सत्संग, विहार चर्या आदि में सरकारी नियमों
का पूर्ण ध्यान रखे। इस विकट परिस्थिति में अपने पूर्व घोषित चातुर्मास क्षेत्र या अपनी संस्था तक भी
पहुँचने का मोह त्याग कर जो जहाँ है वही आसपास नजदीक के क्षेत्र में चातुर्मास करने का ही विचार
करें।
एक सामान्य साधु की तरह सरकारी व्यवस्थाओं का सहयोग लेकर पद विहार कर निकटतम चातुर्मास स्थल
की ओर बढ़े। इस संकट के समय में विवेक पूर्वक कार्य करेंगे तो जिन आज्ञा के आराधक एवं जिनशासन
के प्रभावक कहलाएंगे। आज जैन साधु के त्याग का ही महत्व हैं। त्याग, विवेक, संयम से कार्य लेंगे तो समाज
सदेव आपकी सेवा में रहेगा। इस विकट परिस्थिति में किसी भी प्रकार की सेवा की आवश्यकता हो तो अवश्य
फरमावें।


सहमंगल मैत्री,
दिनांक - 15.05.2020 
स्थान - सूरत, गुजरात
 (आचार्य शिवमुनि)

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भीषण गर्मी में विहार करते है (कविता)



भीषण गर्मी मे भी  साधु भगवंत जी विहार करते

जैन धर्म मे कोरोना महामारी से बचने का उपाय


भारतवर्ष में 2500 वर्ष पूर्व मास्क का अविष्कार करने वाले जैन धर्म के इन पांच आदर्शों पर इस समय पूरी दुनिया चल रही है।

श्रावक के 14 नियम


श्रावक के 14 नियम जो हमें रोज़ लेने चाहिये .....

*१. सचित्त :- सचित्त अर्थात जिस पदार्थ में जीव राशि है ।
इसमें सचित पदार्थो के सेवन की दैनिक मर्यादा रखी जाती है।
सचित्त पदार्थ वे है . जैसे कच्ची हरी सब्जी , कच्चे फल , नमक , कच्चा पानी, कच्चा पूरा धान आदि का सम्पूर्ण त्याग अथवा इतनी संख्या से अधिक उपयोग नही करूँगा ऐसा नियम करना । ( 3, 5 ,7 आदि )

*२ . द्रव्य :- खाने – पीने की वस्तु / द्रव्य की प्रतिदिन मर्यादा रखनी है , इसमें पदार्थो की संख्या का निश्चय किया जाता है ।
भिन्न भिन्न नाम व स्वाद वाली वस्तुएं इतनी संख्या से अधिक खाने के काम में नहीं लूँगा ।
जैसे खिचड़ी , रोटी, दाल, शाक, मिठाई, पापड़, चावल आदि की मर्यादा करना । (11, 15, 21  आदि )

*३ . विगई :- प्रतिदिन दूध, दही, घी, तेल और मीठा (घी या तेल में तली हुई वस्तुएँ) ये 5 सामान्य विगई है और मक्खन एवं शहद महाविगई है।
इनका यथाशक्ति त्याग करना या रोज कम से कम 1 विगई का त्याग करना, एवं अन्य विगई की मर्यादा करना।

*४. उपानह (वहाण) :- जूता, मोजा, चप्पल, आदि पाँव में पहनने की चीजो की मर्यादा रखें । ( 3, 5 ,7 आदि )

*५.तम्बोल :- मुखवास के योग्य पदार्थों , पान, सुपारी, खटाई, इलायची आदि का त्याग करना या दैनिक के लिए परिमाण रखना । ( 3, 5 ,7 आदि )

*६. वत्थ :- पहनने, ओढ़ने के वस्त्रों की दैनिक मर्यादा रखना । ( 5 ,10, 15, 20  आदि )
आज में ..... संख्या में वस्त्रों को अपने शरीर पर धारण करूँगा , इससे अधिक वस्त्रों को नहीं पहनूंगा ।

*७. कुसुम :- पुष्प, तेल, इत्र, अगरबत्ती आदि सुगंधित पदार्थों का दैनिक मर्यादा रखना । ( 3, 5 ,7 आदि )


*८. वाहन :- रिक्शा, स्कूटर, कार, बस, ट्रेन आदि का दैनिक उपयोग या मर्यादा करें ।  ( 3, 5 ,7 आदि )

*९. शयन :- शय्या, आसन, कुर्सी, बिछोना, पलंग आदि का प्रमाण करना ( 5 ,10, 15  आदि )

*१०. विलेपन :- केसर, चन्दन, उबटन, साबुन, तेल, क्रीम, पाउडर आदि का प्रमाण करें ।  ( 3, 5 ,7 आदि )

*११. ब्रह्मचर्य :- परस्त्री का सर्वथा त्याग , स्वस्त्री के साथ मर्यादा का संकल्प करें ।

*१२. दिशा :- दश दिशाओ में अथवा एक दिशा में इतने कि. मी. से अधिक दूर जाने की सीमा निश्चित करना । (50 या 100 किलोमीटर )

*१३. स्नान :- श्रावक प्रतिदिन स्नान ना करे, अतः स्नान का त्याग, या पानी की मर्यादा करना)

*१४.भत्त नियम :- प्रतिदिन अन्न पानी आदि चारो आहारों का तोल/माप रखना । (रात्रिभोजन का त्यागकरना )

इन १४ नियमों को धरणेवाले
*प्रातः काल सूर्योदय और सांयकाल के समय शुद्ध भूमि पर बैठकर ३ नवकार गिनकर* निम्नलिखित पच्चक्खान लें ।

*देसावगासियं भोगपरिभोगं पच्चखामि अन्नथणाभोगेनं सहसागारेणं महत्तरागारेणं सव्वसमाहि वत्तियागारेणम् वोसिरामी ।*

इन १४ नियम के अतिरिक्त अन्य भी कुछ नियम है जो उपयोगी होने से उनका पालन करना जरुरी है ।

१. *पृथ्वीकाय* :- मिट्टी, नमक, पत्थर आदि जो खाने व किसी काम के उपयोग में आवे उनका प्रमाण करना।

२. *अप् काय* :- जो पानी स्नान करने, धोने, नहाने व पिने के काम में आवे उसका प्रमाण करना ।

३. *तेउकाय* :- चूल्हा, भटटी, चिराग, गैस, बिजली, स्वीच आदि का प्रमाण करना ।

४. *वायुकाय* :- झुला पंखा कूलर ए.सी. आदि वापरने की मर्यादा रखना ।

५. *वनस्पतिकाय*:-हरी वनस्पति वापरने का प्रमाण करना ।
६. *त्रसकाय* :- निरपराधी चलते फिरते जीवो को न मारने का नियम रखना , अनजाने में मर जाये तो मिच्छा मी दुक्क्डम देना आज तक हमने बहुत कर्म बंधन कर लिए 

आज से हम १४ नियम आदि का पालन करके अनंत जीवों को अभयदान दे सकते हैं ।

*जब जागो तब सवेरा*
अभी इसी वक्त से श्रावक के १४ नियम लेने का संकल्प लेकर कर् निर्जरा की ओर अपना एक और कदम उठायें।
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सुपात्र दान (गोचरी) देने के लिये निम्न बातों का ध्यान रखना आवशयक है





सुपात्र दान  GOCHARI  गोचरी


🔺साधू-साध्वी जो अपने जीवन निर्वाह के लिए शुद्ध आहार--पानी ग्रहण करते है, उसे गोचरी कहते है। पंच महाव्रतधारी साधु-साध्वियों को श्रावक निर्दोष आहार--पानी बहरावें, उसे सुपात्र दान कहते है। सुपात्र दान देने से कर्मो की महान् निर्जरा होती है!




सुपात्र दान देने के लिये निम्न बातों का ध्यान रखना आवशयक है---

🔸असूझता व्यक्ति दरवाजा ना खोले यानि कच्चा पानी, हरी सब्जी या Electronics घड़ी,
मोबाइल आदि से संयुक्त हो, तो दरवाजा नहीं खोलना, बहराने के लिए भी आगे नहीं आना। घंटी नहीं बजाना, फूँक नहीं मारना, चुटकी-ताली नहीं बजाना।

🔸सात--आठ कदम सामने लेने जावे। सिर झुकाकर "मत्थेएण 
वंदामि" बोले । 

🔸महाराज साहब को देखकर लाईट--पंखा, टी.वी. आदि को ऑन-ऑफ न करें, जैसे है वैसे ही रहने देवें ।

🔸कच्चा पानी, हरी वनस्पति, ऊग सके ऐसे बीज जैसे राई, सरसों, धनिया, कच्चा जीरा, कच्चा नमक आदि पदार्थो को तथा कच्चा सलाद, अंकुरित धान्य, फ्रिज, अग्नि से स्पर्श किये हुए पदार्थो को बहराने के लिये नहीं उठाएँ ।

🔸आहार-पानी के बाद औषध- भेषज, वस्त्र, पात्र अन्य कोई सेवाकार्य हो, तो पूछें। स्थानक में, धर्मस्थान में, गोचरी के लिए मेरे घर चलो ऐसा न कहें।

🔸अहो भाव पूर्वक बहरायें, मन में प्रसन्नता के भाव रखें तथा बोलें बड़ी कुपा की, बारम्बार हमें सेवा का मौका प्रदान करें। पदार्थ शुद्धि, पात्र शुद्धि और पश्चात् शुद्धि का ध्यान रखना विवेक है ।

🔸आस-पास के घर बतावें एवं गली तक पहुँचाने जावें! बहराते हुए अन्नादि से हाथ भर जाये, तो कच्चे पानी से नहीं धोना!

🔸गोचरी की यतना रखना या बैठकर बहराना!

🔸आहार पानी बहराते हुए घुटने के ऊपर से गिर जावे तो घर असुझता हो जाता है।

🔸निर्दोष आहार पानी बहराना चाहिए! साधु--साध्वियों के निमित्त आहार-पानी नहीं बनाना चाहिए।

🔸ऋषभदेव व महावीर ने पूर्वभवों में सुपात्र दान देकर धर्म का मूल समकित प्राप्त किया एवं कालांतर में तीर्थंकर बने।

🔸नेम--राजुल ने पूर्वभव में प्रासुक जल संतों को बहराया एवं महान् लाभ तीर्थंकर गौत्र बंध को प्राप्त किया!

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