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महावीर भगवान् - जीवन परिचय

 

महावीर भगवान् - जीवन परिचय


१. चयवन - प्राणत देवलोक
२. गर्भ प्रवेश तिथि - आषाढ़ शुक्ला ६
३. गर्भ साहरण तिथि - आश्विन कृष्णा १३
४. जन्म तिथि - चैत्र शुक्ला १३
५. जन्म स्थान - क्षत्रिय कुण्डपुर
६. नाम - वर्धमान,
महावीर,
देवार्य,
ज्ञातनंदन,
वीर,
सन्मति,
७. वर्ण - स्वर्ण ( तप्त स्वर्ण के समान )
८. चिन्ह - सिंह
९. पिता का नाम - सिद्धार्थ राजा
१०. माता का नाम - त्रिशलादेवी
११. मामा का नाम - गणतंत्र अध्यक्ष चेटक
१२. वंश - इक्षवाकु
१३. गोत्र - काश्यप
१४. पत्नी का नाम - यशोदा
१५. पुत्री का नाम - प्रियदर्शना
१६. भाई का नाम - नन्दीवर्धन
१७. बहन का नाम - सुदर्शना
१८. कुमार काल - ३० वर्ष
१९. शरीर प्रमाण - ७ हाथ प्रमाण
२०. गृहवास में ज्ञान - मति, श्रुत, अवधिज्ञान
२१. दीक्षा तिथि - मार्ग शीर्ष कृष्णा १०
२२. दीक्षा स्थल - क्षत्रिय कुण्डपुर
२३. दीक्षा के समय तप - दो दिन की तपस्या
२४. दीक्षा पर्याय - ४२ वर्ष
२५. दीक्षा वृक्ष - अशोक वृक्ष
२६. दीक्षा परिवार - अकेले दीक्षित
२७. साधना काल - १२ वर्ष, ६ मास, १५ दिन
२८. प्रथम देशना स्थल - ज्रिभंक ग्राम ( देवों के बीच में )
२९. प्रथम देशना तिथि - वैशाख शुक्ला १०
३०. द्वितीय देशना तिथि - वैशाख शुक्ला एकादशमी
३१. द्वितीय देशना स्थल - मध्यम अपापा ( पावापुरी )
३२. अंतिम देशना स्थल - पावापुरी हस्तिपाल राजा की
शाळा
३३. प्रथम पारणा स्थल - कोल्लाग सन्निवेश
३४. प्रथम पारणा दाता - बहुल ब्राह्मण
३५. केवलज्ञान तिथि - वैशाख शुक्ला १०
३६. केवलज्ञान स्थल - ऋजुबालिका नदी के किनारे
३७. केवलज्ञान के समय तप - दो दिन का उपवास
३८. केवल ज्ञान का समय - दिन का अंतिम प्रहर
३९. तीर्थोत्पति - दुसरे समवसरण में तीर्थ व संघ की उत्पत्ति
४०. आयु - ७२ वर्ष
४१. गणधर - इन्द्रभूति आदि ११ गणधर
४२. केवलज्ञानी - ७००
४३. अवधिज्ञानी - १३००
४४. मनःपर्यव ज्ञानी - ५००
४५. साधू संपदा - १४०००
४६. साध्वी संपदा - ३६०००
४७. श्रावक संख्या - १,५९,०००
४८. श्राविका संख्या - ३,१८,०००
४९. चातुर्मास संख्या - ४२
५०. निर्वाण कल्याण तिथि - कार्तिक कृष्णा अमावस्या
५१. निर्वाण भूमि - पावापुरी ( बिहार )
५२. मोक्ष परिवार - एकाकी सिद्ध
५३. अंतर मान - पार्श्वनाथ तीर्थंकर के परिनिर्वाण के बाद
२५० वर्ष का भगवान महावीर के परिनिर्वाण का अंतर
५४. मोक्षासन - पर्यकासन
५५. भव संख्या - ( सम्यक्त्व की प्राप्ति के पाश्चात् ) - २७
( नयसार के भव में सम्यक्त्व की प्राप्ति
 )

शिक्षा

सत्य
सत्य के बारे में भगवान महावीर स्वामी कहते हैं, हे पुरुष! तू
सत्यको ही सच्चा तत्व समझ। जो बुद्धिमान सत्य की
हीआज्ञा में रहता है, वह मृत्यु को तैरकर पार कर जाता है।

अहिंसा
इस लोक में जितने भी त्रस जीव (एक, दो, तीन, चार और
पाँचइंद्रिय वाले जीव) आदि की हिंसा मत कर, उनको उनके
पथपर जाने से न रोको। उनके प्रति अपने मन में दया का
भावरखो। उनकी रक्षा करो। यही अहिंसा का संदेश भगवान
महावीरअपनेउपदेशों से हमें देते हैं।

अपरिग्रह
परिग्रह पर भगवान महावीर कहते हैं जो आदमी खुद सजीव
यानिर्जीव, चीजों का संग्रह करता है, दूसरों से ऐसा
संग्रहकराता है या दूसरों को ऐसा संग्रह करने की सम्मति देता
है,उसको दुःखों से कभी छुटकारा नहीं मिल सकता। यही संदेश
अपरिग्रह का माध्यम से भगवान महावीर दुनिया को
देनाचाहते हैं।

ब्रह्मचर्य
महावीर स्वामी ब्रह्मचर्य के बारे में अपने बहुत ही अमूल्यउपदेश
देते हैं कि ब्रह्मचर्य उत्तम तपस्या, नियम, ज्ञान, दर्शन,चारित्र,
संयम और विनय की जड़ है। तपस्या में ब्रह्मचर्य श्रेष्ठ तपस्या है।
जो पुरुष स्त्रियों से संबंध नहीं रखते, वे मोक्ष मार्गकी ओर बढ़ते
हैं।

क्षमा
क्षमा के बारे में भगवान महावीर कहते हैं- 'मैं सब जीवों सेक्षमा
चाहता हूँ। जगत के सभी जीवों के प्रति मेरामैत्रीभाव है। मेरा
किसी से वैर नहीं है। मैं सच्चे हृदय से धर्म में स्थिर हुआ हूँ। सब
जीवों से मैं सारे अपराधों की क्षमामाँगता हूँ। सब जीवों ने मेरे
प्रति जो अपराध किए हैं, उन्हें मैं क्षमा करता हूँ।'वे यह भी कहते
हैं 'मैंने अपने मन में जिन-जिन पाप की वृत्तियों का संकल्प
किया हो, वचन से जो-जो पाप वृत्तियाँ प्रकटकी हों और
शरीर से जो-जो पापवृत्तियाँ की हों, मेरी वेसभी
पापवृत्तियाँ विफल हों। मेरे वे सारे पाप मिथ्या हों।'

धर्म
धर्म सबसे उत्तम मंगल है। अहिंसा, संयम और तप ही धर्म है।
महावीरजी कहते हैं जो धर्मात्मा है, जिसके मन में सदा
धर्मरहता है, उसे देवता भी नमस्कार करते हैं।भगवान महावीर ने
अपने प्रवचनोंमेंधर्म,सत्य,अहिंसा,ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह, क्षमा
पर सबसे अधिक जोर दिया।त्याग और संयम, प्रेम और करुणा,
शील और सदाचार ही उनकेप्रवचनों का सार था। भगवान
महावीर ने चतुर्विध संघ कीस्थापना की। देश के भिन्न-भिन्न
भागों में घूमकर भगवानमहावीर ने अपना पवित्र संदेश फैलाया।
भगवान महावीर ने ७२ वर्ष की अवस्था में ईसापूर्व ५२७ में बिहार
के पावापुरी(राजगीर) में कार्तिक कृष्ण अमावस्या को
निर्वाण प्राप्त किया।

मुझे गर्व है कि मैं जैन हुं क्योंकि मेरे परमात्मा सत्य, अहिंसा,
अपरिग्रह, ब्रह्मचर्य, और क्षमा का उपदेश सिर्फ़ देते ही नहीं
बल्कि सर्व समर्थ होते हुए भी इन्हें अपने जीवन में अपनाते भी
महावीर स्वामी जी जैन धर्म के चौंबीसवें तीर्थंकर है।

करीब ढाई हजार साल पुरानी बात है। ईसा से 599 वर्ष पहले
वैशाली गणतंत्र के क्षत्रिय कुण्डलपुर में
पिता सिद्धार्थ और माता त्रिशला के
यहाँ तीसरी संतान के रूप में चैत्र शुक्ल तेरस को वर्द्धमान
का जन्म हुआ। यही वर्द्धमान बाद में स्वामी महावीर बना। 
महावीर को 'वीर', 'अतिवीर' और 'सन्मति' भी कहा जाता है।
जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर महावीर स्वामी अहिंसा के
मूर्तिमान प्रतीक थे। उनका जीवन त्याग और तपस्या से
ओतप्रोत था। उन्होंने एक लँगोटी तक का परिग्रह
नहीं रखा। हिंसा, पशुबलि, जाति-पाँति के भेदभाव जिस युग 
में बढ़ गए, उसी युग में ही भगवान महावीर ने
जन्म लिया। उन्होंने दुनिया को सत्य, अहिंसा का पाठ
पढ़ाया। पूरी दुनिया को उपदेश दिए।
उन्होंने दुनिया को पंचशील के सिद्धांत बताए। इसके
अनुसार- सत्य, अपरिग्रह, अस्तेय, अहिंसा और क्षमा।
उन्होंने अपने कुछ खास उपदेशों के माध्यम से कोशिश दुनिया 
को सही राह दिखाने की  की। 
अपने अनेक प्रवचनों से दुनिया का सही मार्गदर्शन किया।

जन्म करीब ढाई हजार साल पुरानी बात है। ईसा से 540 वर्ष पहले
वैशाली गणतंत्र के क्षत्रिय कुण्डलपुर में
पिता सिद्धार्थ और माता त्रिशला के
यहाँ तीसरी संतान के रूप में चैत्र शुक्ल तेरस को वर्द्धमान
का जन्म हुआ। यही वर्द्धमान बाद में स्वामी महावीर बना।
जीवन भगवान महावीर आदेश्वर परमात्मा से प्रारंभ वर्तमान
चौबीसी के अंतिम तीर्थंकर थे। प्रभु महावीर की जीवन
गाथा यही है कि सिद्धार्थ नंदन, त्रिशला लाल के
प्रारंभिक तीस वर्ष राजसी वैभव एवं विलास के दलदल
में 'कमल' के समान रहे।
मध्य के बारह वर्ष घनघोर जंगल में मंगल साधना और 
आत्म जागृति की आराधना में, 
बाद के तीस वर्ष न केवल जैन
जगत या मानव समुदाय के लिए अपितु प्राणी मात्र के
कल्याण एवं मुक्ति मार्ग की प्रशस्ति में व्यतीत हुए।
जनकल्याण हेतु उन्होंने चार तीर्थों साधु-साध्वी-श्रावक-
श्राविका की रचना की। इन सर्वोदयी तीर्थों में क्षेत्र,
काल, समय या जाति की सीमाएँ नहीं थीं। 
भगवान महावीर का आत्म धर्म जगत की
प्रत्येक आत्मा के लिए समान था। 
दुनिया की सभी आत्मा एक-सी हैं इसलिए
हम दूसरों के प्रति वही विचार एवं व्यवहार रखें जो हमें
स्वयं को पसंद हो। यही महावीर का 'जीयो और जीने दो'
का सिद्धांत है।

भगवान महावीर आदेश्वर परमात्मा से प्रारंभ वर्तमान चौबीसी के 
अंतिम तीर्थंकर थे। 
प्रभु महावीर की जीवन गाथा यही है कि सिद्धार्थ नंदन, त्रिशला लाल के
प्रारंभिक तीस वर्ष राजसी वैभव एवं विलास के दलदल
में 'कमल' के समान रहे।
आज से करीब छब्बीस सौ वर्ष पूर्व भगवान महावीर भारत
की पावन माटी पर प्रकट हुए थे। इतने वर्षों के बाद भी भगवान महावीर
का नाम स्मरण उसी श्रद्धा और
भक्ति से लिया जाता है, इसका मूल कारण यह है
कि महावीर ने इस जगत को न केवल मुक्ति का संदेश
दिया, अपितु मुक्ति की सरल और सच्ची राह
भी बताई। भगवान महावीर ने आत्मिक और शाश्वत सुख
की प्राप्ति हेतु पाँच सिद्धांत हमें बताए : सत्य, अहिंसा, अपरिग्रह, 
अचौर्य और ब्रह्मचर्य।
वर्तमान में वर्तमान अशांत, आतंकी, भ्रष्ट और हिंसक वातावरण में
महावीर की अहिंसा ही शांति प्रदान कर सकती है।
महावीर की अहिंसा केवल सीधे वध
को ही हिंसा नहीं मानती है, अपितु मन में किसी के
प्रति बुरा विचार भी हिंसा है। जब मानव का मन
ही साफ नहीं होगा तो अहिंसा को स्थानही कहाँ?
 वर्तमान युग में प्रचलित नारा 'समाजवाद' तब तक
सार्थक नहीं होगा जब तक आर्थिक विषमता रहेगी।
एक ओर अथाह पैसा, दूसरी ओर अभाव। इस
असमानता की खाई को केवल भगवान महावीर
का 'अपरिग्रह' का सिद्धांत ही भर सकता है।
अपरिग्रह का सिद्धांत कम साधनों में अधिक संतुष्टिपर बल देता है। 
यह आवश्यकता से ज्यादा रखने
की सहमति नहीं देता है। इसलिए सबको मिलेगा और
भरपूर मिलेगा।

जब अचौर्य की भावना का प्रचार-प्रसार और पालन
होगा तो चोरी, लूटमार का भय ही नहीं होगा। सारे जगत में
मानसिक और आर्थिक शांति स्थापित होगी।
 चरित्र और संस्कार के अभाव में सरल, सादगीपूर्ण एवं
गरिमामय जीवन जीना दूभर होगा। भगवान महावीर ने हमें
अमृत कलश ही नहीं, उसके रसपान का मार्ग भी बताया है।



जन्म चैत्र शुक्ल त्रयोदशी
जन्म स्थान: कुंडलपुर माता:त्रिशला
पिता:सिद्धार्थजी
निर्वाण कार्तिक अमावस्या
निर्वाण स्थान :पावापुरी
निशान :सिंह

जैन तीर्थंकरों का परिचय

जैन तीर्थंकरों का परिचय 


जैन धर्म के 24 तीर्थंकर है। इसमें से प्रथम तथा अंतिम चार तीर्थंकरों के बारे में बहुत कुछ पढ़ने को मिलता है किंतु उक्त के बीच के तीर्थंकरों के बारे में कम
ही जानकारी मिलती हैं। निश्चित ही जैन
शास्त्रों में इनके बारे में बहुत कुछ लिखा होगा, लेकिन आम जनता उनके बारे में कम ही जानती है।
यहाँ प्रस्तुत है 24 तीर्थंकरों का सामान्य परिचय।


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१) आदिनाथ :- प्रथम तीर्थंकर आदिनाथ को ऋषभनाथ भी कहा जाता है और हिंदू इन्हें वृषभनाथ कहते हैं। आपके पिता का नाम राजा नाभिराज था और माता का नाम मरुदेवी था। आपका जन्म चैत्र कृष्ण पक्ष की अष्टमी-नवमी को अयोध्या में हुआ। चैत्र
माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को आपने
दीक्षा ग्रहण की तथा फाल्गुन कृष्ण पक्ष
की अष्टमी के दिन आपको कैवल्य
की प्राप्ती हुई। कैलाश पर्वत क्षेत्र के अष्टपद में आपको माघ कृष्ण-१४ को निर्वाण प्राप्त हुआ।
जैन धर्मावलंबियों अनुसार आपका प्रतीक चिह्न- बैल, चैत्यवृक्ष- न्यग्रोध, यक्ष- गोवदनल,यक्षिणी-चक्रेश्वरी हैं।

२) अजीतनाथजी : द्वितीय तीर्थंकर
अजीतनाथजी की माता का नाम
विजया और पिता का नाम जितशत्रु था।आपका जन्म माघ शुक्ल पक्ष
की दशमी को अयोध्या में हुआ था। माघ शुक्ल पक्ष की नवमी को आपने दीक्षा ग्रहण की तथा पौष शुक्ल पक्ष
की एकादशी को आपको कैवल्य ज्ञान
की प्राप्ति हुई। चैत्र शुक्ल की पंचमी को आपको सम्मेद शिखर पर निर्वाण
प्राप्त हुआ। जैन धर्मावलंबियों अनुसार
उनका प्रतीक चिह्न- गज, चैत्यवृक्ष- सप्तपर्ण,यक्ष- महायक्ष, यक्षिणी- रोहिणी है।

३) सम्भवनाथजी : तृतीय तीर्थंकर
सम्भवनाथजी की माता का नाम सुसेना और पिता का नाम जितारी है।
सम्भवनाथजी का जन्म मार्गशीर्ष
की चतुर्दशी को श्रावस्ती में हुआ था।
मार्गशीर्ष के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा के दिन आपने दीक्षा ग्रहण की तथा कठोर तपस्या के बाद कार्तिक कृष्ण की पंचमी को आपको कैवल्य ज्ञान की प्राप्ति हुई। चैत्र शुक्ल पक्ष की पंचमी को सम्मेद शिखर पर आपको निर्वाण प्राप्त हुआ। जैन धर्मावलंबियों अनुसार उनका प्रतीक चिह्न- अश्व, चैत्यवृक्ष- शाल,
यक्ष- त्रिमुख, यक्षिणी- प्रज्ञप्ति।

४) अभिनंदनजी : चतुर्थ तीर्थंकर
अभिनंदनजी की माता का नाम
सिद्धार्था देवी और पिता का नाम सन्वर
(सम्वर या संवरा राज) है। आपका जन्म माघ शुक्ल की बारस को अयोध्या में हुआ। माघ शुक्ल
की बारस को ही आपने दीक्षा ग्रहण
की तथा कठोर तप के बाद पौष शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को आपको कैवल्य ज्ञान की प्राप्ति हुई। बैशाख शुक्ल
की छटमी या सप्तमी के दिन सम्मेद शिखर पर आपको निर्वाण प्राप्त हुआ। जैन धर्मावलंबियों अनुसार उनका प्रतीक चिह्न-बंदर, चैत्यवृक्ष- सरल, यक्ष- यक्षेश्वर, यक्षिणी-व्रजश्रृंखला है।

५) सुमतिनाथजी : पाँचवें तीर्थंकर
सुमतिनाथजी के पिता का नाम मेघरथ
या मेघप्रभ तथा माता का नाम सुमंगला था।बैशाख शुक्ल
की अष्टमी को साकेतपुरी (अयोध्या) में
आपका जन्म हुआ। कुछ विद्वानों अनुसार आपका जन्म चैत्र शुक्ल की एकादशी को हुआ था। बैशाख शुक्ल की नवमी के दिन आपने दीक्षा ग्रहण की तथा चैत्र शुक्ल पक्ष की एकादशी को आपको कैवल्य ज्ञान की प्राप्ति हुई। चैत्र शुक्ल की एकादशी को सम्मेद शिखर पर आपको निर्वाण प्राप्त हुआ। जैन
धर्मावलंबियों अनुसार उनका प्रतीक चिह्न- चकवा, चैत्यवृक्ष- प्रियंगु, यक्ष- तुम्बुरव,यक्षिणी- वज्रांकुशा है।

६) पद्ममप्रभुजी : छठवें तीर्थंकर पद्मप्रभुजी के पिता का नाम धरण राज और माता का नाम सुसीमा देवी था। कार्तिक कृष्ण पक्ष की द्वादशी को आपका जन्म वत्स कौशाम्बी में हुआ। कार्तिक कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को आपने दीक्षा ग्रहण की तथा चैत्र शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा के दिन आपको कैवल्य ज्ञान की प्राप्ति हुई। फाल्गुन कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को आपको सम्मेद शिखर
पर निर्वाण प्राप्त हुआ। जैन धर्मावलंबियों अनुसार उनका प्रतीक चिह्न-कमल, चैत्यवृक्ष- प्रियंगु, यक्ष-मातंग, यक्षिणी-अप्रति चक्रेश्वरी है।

७) सुपार्श्वनाथ : सातवें तीर्थंकर सुपार्श्वनाथ के पिता का नाम प्रतिस्थसेन तथा माता का नाम पृथ्वी देवी था।आपका जन्म वाराणसी में ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की बारस को हुआ था। ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष अंकी त्रयोदशी को आपने दीक्षा ग्रहण की तथा फाल्गुन कृष्ण पक्ष की सप्तमि आपको कैवल्य ज्ञान प्राप्त हुआ।फाल्गुन कृष्ण पक्ष की सप्तमी के दिन आपको सम्मेद शिखर पर निर्वाण प्राप्त हुआ। जैन धर्मावलंबियों अनुसार आपका प्रतीक चिह्न-स्वस्तिक,चैत्यवृक्ष- शिरीष, यक्ष- विजय, यक्षिणी- पुरुषदत्ता है।

८) चंद्रप्रभु : आठवें तीर्थंकर चंद्रप्रभु के
पिता का नाम राजा महासेन
तथा माता का नाम सुलक्षणा था।
आपका जन्म पौष कृष्ण पक्ष की बारस के दिन चंद्रपुरी में हुआ। पौष कृष्ण पक्ष
की त्रयोदशी को आपने दीक्षा ग्रहण
की तथा फाल्गुन कृष्ण पक्ष सात
को आपको कैवल्य ज्ञान की प्राप्ती हुई।
भाद्रपद के कृष्ण पक्ष की सप्तमी को आपको सम्मेद शिखर पर निर्वाण प्राप्त हुआ। जैन धर्मावलंबियों अनुसार आपका प्रतीक चिह्न-अर्द्धचंद्र, चैत्यवृक्ष- नागवृक्ष, यक्ष- अजित,यक्षिणी- मनोवेगा है।

९) सुविधिनाथ : नवें तीर्थंकर पुष्पदंत
को सुविधिनाथ भी कहा जाता है। आपके पिता का नाम राजा सुग्रीव राज
तथा माता का नाम रमा रानी था,
जो इक्ष्वाकू वंश से थी। मार्गशीर्ष के कृष्ण पक्ष की पंचमी को काकांदी में आपका जन्म हुआ।मार्गशीर्ष के कष्णपक्ष की छट (६) को आपने
दीक्षा ग्रहण की तथा कार्तिक कृष्ण पक्ष
की तृतीय (३) को आपको सम्मेद शिखर में कैवल्य की प्राप्ती हुई। भाद्र के शुक्ल पक्ष की नवमी को आपको सम्मेद शिखर पर निर्वाण प्राप्त हुआ। जैन धर्मावलंबियों अनुसार आपका प्रतीक चिह्न- मकर, चैत्यवृक्ष- अक्ष (बहेड़ा), यक्ष- ब्रह्मा, यक्षिणी- काली है।

१०) शीतलनाथ : दसवें तीर्थंकर शीतलनाथ के पिता का नाम दृढ़रथ (Dridharatha) और माता का नाम सुनंदा था। आपका जन्म माघ
कृष्ण पक्ष की द्वादशी (१२) को बद्धिलपुर(Baddhilpur) में हुआ। मघा कृष्ण पक्ष की द्वादशी को आपने दीक्षा ग्रहणकी तथा पौष कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी (१४)को आपको कैवल्य ज्ञान की प्राप्ती हुई।बैशाख के कृष्ण पक्ष की दूज को आपको सम्मेद
शिखर पर निर्वाण प्राप्त हुआ। जैन
धर्मावलंबियों अनुसार आपका प्रतीक चिह्न-कल्पतरु, चैत्यवृक्ष- धूलि (मालिवृक्ष), यक्ष-ब्रह्मेश्वर, यक्षिणी- ज्वालामालिनी है।

११) श्रेयांसनाथजी : ग्यारहवें तीर्थंकर
श्रेयांसनाथजी की माता का नाम
विष्णुश्री या वेणुश्री था और पिता का नाम विष्णुराज। सिंहपुरी नामक स्थान पर फागुन कृष्ण पक्ष की ग्यारस को आपका जन्म हुआ।श्रावण शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को सम्मेद शिखर
(शिखरजी) पर आपको निर्वाण प्राप्त हुआ। जैन धर्मावलंबियों अनुसार उनका प्रतीक चिह्न-गेंडा, चैत्यवृक्ष- पलाश, यक्ष- कुमार, यक्षिणी-महाकालीहै।

१२) वसुपूज्य : बारहवें तीर्थंकर वासुपूज्य प्रभु के पिता का नाम वसुपूज्य (Vasupujya) और
माता का नाम विजया था। आपका जन्म फाल्गुन कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी
को चंपापुरी में हुआ था। फाल्गुन कृष्ण पक्ष की अमावस्या को आपने दीक्षा ग्रहण की तथा मघा की दूज (२) को कैवल्य ज्ञान की प्राप्ती हुई। आषाड़ के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को चंपा में आपको निर्वाण प्राप्त हुआ। जैन धर्मावलंबियों अनुसार आपका प्रतीक चिह्न- भैंसा, चैत्यवृक्ष- तेंदू, यक्ष-
षणमुख, यक्षिणी- गौरी है।

१३) विमलनाथ : तेरहवें तीर्थंकर विमलनाथ के पिता का नाम कृतर्वेम (Kritaverma)तथामाता का नाम श्याम देवी (सुरम्य) था।आपका जन्म मघा शुक्ल तीज को कपिलपुर में हुआ
था। मघा शुक्ल पक्ष की तीज को ही आपने दीक्षा ग्रहण की तथा पौष शुक्ल पक्ष की षष्ठी के दिन कैवल्य की प्राप्ति हुई।आषाढ़ शुक्ल की सप्तमी के दिन श्री सम्मेद शिखर पर निर्वाण प्राप्त हुआ। जैन धर्मावलंबियों अनुसार आपका प्रतीक चिह्न-शूकर, चैत्यवृक्ष- पाटल, यक्ष- पाताल,यक्षिणी- गांधारी।

१४) अनंतनाथजी : चौदहवें तीर्थंकर
अनंतनाथजी की माता का नाम
सर्वयशा तथा पिता का नाम सिहसेन था।आपका जन्म अयोध्या में वैशाख कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी (१३) के दिन हुआ। वैशाख कृष्ण पक्ष चतुर्दशी (१४) को आपने दीक्षा ग्रहण की तथा कठोर तप के बाद वैशाख कृष्ण की त्रयोदशी के दिन ही कैवल्य ज्ञान की प्राप्ति हुई। चैत्र शुक्ल की पंचमी के दिन
आपको सम्मेद शिखर पर निर्वाण प्राप्त हआ। जैन धर्मावलंबियों अनुसार उनका प्रतीक चिह्न-सेही, चैत्यवृक्ष- पीपल, यक्ष- किन्नर, यक्षिणी-वैरोटी है।

१५) धर्मनाथ : पंद्रहवें तीर्थंकर श्री धर्मनाथ के पिता का नाम भानु और माता का नाम सुव्रत था। आपका जन्म मघा शुक्ल की तृतीया (३)को रत्नापुर में हुआ था। मघा शुक्ल की त्रयोदशी को आपने दीक्षा ग्रहण की तथा पौष की पूर्णिमा के दिन आपको कैवल्य की प्राप्ति हुई। ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष
की पंचमी को सम्मेद शिखर पर निर्वाण प्राप्त हुआ। जैन धर्मावलंबियों अनुसार आपका प्रतीक चिह्न- वज्र, चैत्यवृक्ष- दधिपर्ण, यक्ष- किंपुरुष,यक्षिणी- सोलसा।

१६) शांतिनाथ : जैन धर्म के सोलहवें तीर्थंकर शांतिनाथ का जन्म ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को हस्तिनापुर में इक्ष्वाकू कुल में
हुआ। शांतिनाथ के पिता हस्तिनापुर के
राजा विश्वसेन थे और माता का नाम
आर्या (अचीरा) था। आपने ज्येष्ठ माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को दीक्षा ग्रहण की तथा पौष शुक्ल पक्ष की नवमी के दिन आपको कैवल्य की प्राप्ति हुई। ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को सम्मेद शिखर पर
निर्वाण प्राप्त हुआ। जैन धर्मावलंबियों अनुसार आपका प्रतीक चिह्न-
हिरण, चैत्यवृक्ष-नंदी, यक्ष- गरुढ़, यक्षिणी-अनंतमतीहैं।

१७) कुंथुनाथजी : सत्रहवें तीर्थंकर
कुंथुनाथजी की माता का नाम
श्रीकांता देवी (श्रीदेवी) और
पिता का नाम राजा सूर्यसेन था। आपका जन्म वैशाख कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को हस्तिनापुर में
हुआ था। वैशाख कृष्ण पक्ष की पंचमी के दिन दीक्षा ग्रहण की तथा चैत्र शुक्ल पक्ष की पंचमी को कैवल्य ज्ञान की प्राप्ति हुई।वैशाख शुक्ल पक्ष की एकम के दिन सम्मेद शिखर पर निर्वाण प्राप्त हुआ। जैन धर्मावलंबियों अनुसार आपका प्रतीक चिह्न-छाग, चैत्यवृक्ष- तिलक, यक्ष- गंधर्व, यक्षिणी-मानसी है।

१८) अरहनाथजी : अठारहवें तीर्थंकर
अरहनाथजी या अर प्रभु के पिता का नाम सुदर्शन और माता का नाम मित्रसेन देवी था।
आपका जन्म मार्गशीर्ष के शुक्ल पक्ष
की दशमी के दिन ‍हस्तिनापुर में हुआ।मार्गशीर्ष के शुक्ल पक्ष की ग्यारस को आपने दीक्षा ग्रहण की तथा कार्तिक कृष्ण पक्ष की बारस को कैवल्य ज्ञान की प्राप्ति हुई।मार्गशीर्ष की दशमी के दिन सम्मेद शिखर पर निर्वाण की प्राप्ति हुई। जैन धर्मावलंबियों अनुसार उनका प्रतीक चिह्न-तगरकुसुम (मत्स्य), चैत्यवृक्ष- आम्र, यक्ष- कुबेर,
यक्षिणी- महामानसी है।

१९) मल्लिनाथ : उन्नीसवें तीर्थंकर मल्लिनाथ के पिता का नाम कुंभराज और माता का नाम प्रभावती (रक्षिता) था। मार्गशीर्ष के शुक्ल पक्ष की ग्यारस को आपका जन्म मिथिला में हुआ था। मार्गशीर्ष के शुक्ल पक्ष की एकादशी को दीक्षा ग्रहण की तथा इसी माह की तिथि को कैवल्य की प्राप्ति भी हुई। फाल्गुन कृष्ण पक्ष की बारस को सम्मेद शिखर पर निर्वाण प्राप्त हुआ। जैन धर्मावलंबियों अनुसार आपका प्रतीक
चिह्न- कलश, चैत्यवृक्ष- कंकेली (अशोक), यक्ष-वरुण, यक्षिणी- जया है।

२०) मुनिसुव्रतनाथ : बीसवें तीर्थंकर
मुनिसुव्रतनाथ के पिता का नाम सुमित्र
तथा माता का नाम प्रभावती था।
आपका जन्म ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष की आठम को राजगढ़ में हुआ था। फाल्गुन कृष्ण पक्ष की बारस को आपने दीक्षा ग्रहण की तथा फाल्गुन कृष्ण पक्ष की बारस को ही कैवल्य ज्ञान की प्राप्ति हुई। ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष की नवमी को सम्मेद शिखर पर निर्वाण प्राप्त हुआ। जैन धर्मावलंबियों अनुसार आपका प्रतीक चिह्न-कूर्म, चैत्यवृक्ष- चंपक, यक्ष- भृकुटि, यक्षिणी-विजया।

२१) नमिनाथ : इक्कीसवें तीर्थंकर के
पिता का नाम विजय और माता का नाम सुभद्रा (सुभ्रदा-वप्र)था। आप स्वयं मिथिला के राजा थे। आपका जन्म इक्ष्वाकू कुल में श्रावण
मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को मिथिलापुरी में हुआ था।
आषाढ़ मास के शुक्ल की अष्टमी को आपने दीक्षा ग्रहण की तथा मार्गशीर्ष के शुक्ल पक्ष की एकादशी को कैवल्य की प्राप्ति हुई।वैशाख कृष्ण की दशमी को सम्मेद शिखर पर निर्वाण प्राप्त हुआ। जैन धर्मावलंबियों अनुसार आपका प्रतीक चिह्न-उत्पल, चैत्यवृक्ष- बकुल, यक्ष- गोमेध, यक्षिणी-अपराजिता।

२२) नेमिनाथ : बावीसवें तीर्थंकर नेमिनाथ के पिता का नाम राजा समुद्रविजय और माता का नाम शिवादेवी था। आपका जन्म श्रावण मास के कृष्ण पक्ष की पंचमी को शौरपुरी (मथुरा) में यादववंश में
हुआ था। शौरपुरी (मथुरा) के
यादववंशी राजा अंधकवृष्णी के ज्येष्ठ पुत्र समुद्रविजय के पुत्र थे नेमिनाथ। अंधकवृष्णी के सबसे छोटे पुत्र वासुदेव से उत्पन्न हुए भगवान श्रीकृष्ण। इस प्रकार नेमिनाथ और श्रीकृष्ण दोनों चचेरे भाई थे। श्रावण मास के कृष्ण पक्ष की षष्ठी को आपने दीक्षा ग्रहण
की तथा आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष
की अमावस्या को गिरनार पर्वत पर कैवल्य की प्राप्ति हुई। आषाढ़ शुक्ल
की अष्टमी को आपको उज्जैन या गिरनार पर निर्वाण प्राप्त हुआ। जैन
धर्मावलंबियों अनुसार आपका प्रतीक चिह्न-शंख, चैत्यवृक्ष- मेषश्रृंग, यक्ष- पार्श्व, यक्षिणी-बहुरूपिणी।

२३) पार्श्वनाथ : तेवीसवें तीर्थंकर पार्श्वनाथ के पिता का नाम राजा अश्वसेन तथा माता का नाम वामा था। आपका जन्म पौष कृष्ण पक्ष
की दशमी को वाराणसी (काशी) में हुआ था।चैत्र कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को आपने
दीक्षा ग्रहण की तथा चैत्र कृष्ण पक्ष
की चतुर्थी को ही कैवल्य की प्राप्ति हुई।
श्रावण शुक्ल की अष्टमी को सम्मेद शिखर पर निर्वाण प्राप्त हुआ। जैन
धर्मावलंबियों अनुसार आपका प्रतीक चिह्न-सर्प, चैत्यवृक्ष- धव, यक्ष- मातंग, यक्षिणी-कुष्माडी।
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२४) महावीर : चौबीसवें तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी का जन्म नाम वर्धमान,पिता का नाम सिद्धार्थ
तथा माता का नाम त्रिशला(प्रियंकारिनी) था। आपका जन्म
चैत्र शुक्ल की त्रयोदशी के दिन कुंडलपुर में हुआ था। मार्गशीर्ष कृष्ण पक्ष की दशमी को आपने दीक्षा ग्रहण की तथा वैशाख शुक्ल की दशमी के दिन कैवल्य की प्राप्ति हुई। ४२
वर्ष तक आपने साधक जीवन बिताया। कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की अमावस्या के दिन आपको पावापुरी पर ७२ वर्ष में निर्वाण प्राप्त हुआ। जैन धर्मावलंबियों अनुसार आपका प्रतीक
चिह्न- सिंह, चैत्यवृक्ष- शाल, यक्ष- गुह्मक, यक्षिणी- पद्मा सिद्धायिनी।

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