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जानिए क्या कहा जैन मुनि शिवाचार्य जी ने lockdown 4 के बारे मे
श्रमण संघ जयवंत हो
जय महावीर
॥ जय आत्म ॥ ॥ जय आनन्द ॥ ॥ जय देवेन्द्र ॥ ॥ जय ज्ञान॥ ॥ जय शिव आचार्य ||
आध्यात्मिक संदेश
चातुर्मास हेतु वाहन विहार निषेध
आत्मार्थी साधु साध्वीवृंद एवं श्रावक श्राविकाओं से निवेदन हैं कि- चातुर्मास काल ज्यों-ज्यों नजदीक आ
रहा है अधिकांश साधु साध्वीओं को अपने पूर्व घोषित चातुर्मास स्थल की ओर बढ़ने की भावना हो रही है। वर्तमान
में कोरोना वायरस का प्रकोप जिस प्रकार चल रहा है उससे ऐसा लगता है कि यह लंबा चलेगा, फिर भी सबको
सावधानी रखना अनिवार्य है। भारत सरकार द्वारा जारी निर्देशों का पूर्ण पालन आवश्यक है।
अधिकांश साधु साध्वीयोंने सैकड़ों किलोमीटर के विहार का कार्यक्रम परिवर्तित किया है और वे अभी जहां
विराजमान है उसके आसपास के क्षेत्र में उन्होंने अपना चातुर्मास घोषित किया है। यह अभिनंदनीय है।
लॉकडाउन 4 के नियम शीघ्र ही हमारे सामने आने वाले हैं। सरकारी नियमों का पालन राज आज्ञा
है तथा संघ समाचारी का पालन देव आज्ञा है, दोनों का उल्लंघन करने वाला साधु साध्वी तीसरे महाव्रत में
दोष का भागी बनता है।
कुछ लोगों ने यह भ्रम फेलाया है कि वाहन विहार के बारे में आचार्य श्री जी का क्या कहना है?
क्या आचार्य श्री जी ने वाहन विहार की आज्ञा दी है?
आप सभी को सूचित किया जाता है कि - वाहन विहार की आज्ञा किसी को भी नहीं दी गई है,
अगर कोई चातुर्मास स्थल पर पहुँचने के लिए वाहन विहार करेगा तो उस पर उचित कार्यवाही होगी।
सभी साधु साध्वीयों को निवेदन है कि वे प्रवचन, सत्संग, विहार चर्या आदि में सरकारी नियमों
का पूर्ण ध्यान रखे। इस विकट परिस्थिति में अपने पूर्व घोषित चातुर्मास क्षेत्र या अपनी संस्था तक भी
पहुँचने का मोह त्याग कर जो जहाँ है वही आसपास नजदीक के क्षेत्र में चातुर्मास करने का ही विचार
करें।
एक सामान्य साधु की तरह सरकारी व्यवस्थाओं का सहयोग लेकर पद विहार कर निकटतम चातुर्मास स्थल
की ओर बढ़े। इस संकट के समय में विवेक पूर्वक कार्य करेंगे तो जिन आज्ञा के आराधक एवं जिनशासन
के प्रभावक कहलाएंगे। आज जैन साधु के त्याग का ही महत्व हैं। त्याग, विवेक, संयम से कार्य लेंगे तो समाज
सदेव आपकी सेवा में रहेगा। इस विकट परिस्थिति में किसी भी प्रकार की सेवा की आवश्यकता हो तो अवश्य
फरमावें।
दिनांक - 15.05.2020
स्थान - सूरत, गुजरात
(आचार्य शिवमुनि)
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श्रावक के 14 नियम
श्रावक के 14 नियम जो हमें रोज़ लेने चाहिये .....
इसमें सचित पदार्थो के सेवन की दैनिक मर्यादा रखी जाती है।
सचित्त पदार्थ वे है . जैसे कच्ची हरी सब्जी , कच्चे फल , नमक , कच्चा पानी, कच्चा पूरा धान आदि का सम्पूर्ण त्याग अथवा इतनी संख्या से अधिक उपयोग नही करूँगा ऐसा नियम करना । ( 3, 5 ,7 आदि )
*२ . द्रव्य :- खाने – पीने की वस्तु / द्रव्य की प्रतिदिन मर्यादा रखनी है , इसमें पदार्थो की संख्या का निश्चय किया जाता है ।
भिन्न भिन्न नाम व स्वाद वाली वस्तुएं इतनी संख्या से अधिक खाने के काम में नहीं लूँगा ।
जैसे खिचड़ी , रोटी, दाल, शाक, मिठाई, पापड़, चावल आदि की मर्यादा करना । (11, 15, 21 आदि )
*३ . विगई :- प्रतिदिन दूध, दही, घी, तेल और मीठा (घी या तेल में तली हुई वस्तुएँ) ये 5 सामान्य विगई है और मक्खन एवं शहद महाविगई है।
इनका यथाशक्ति त्याग करना या रोज कम से कम 1 विगई का त्याग करना, एवं अन्य विगई की मर्यादा करना।
*४. उपानह (वहाण) :- जूता, मोजा, चप्पल, आदि पाँव में पहनने की चीजो की मर्यादा रखें । ( 3, 5 ,7 आदि )
*५.तम्बोल :- मुखवास के योग्य पदार्थों , पान, सुपारी, खटाई, इलायची आदि का त्याग करना या दैनिक के लिए परिमाण रखना । ( 3, 5 ,7 आदि )
*६. वत्थ :- पहनने, ओढ़ने के वस्त्रों की दैनिक मर्यादा रखना । ( 5 ,10, 15, 20 आदि )
आज में ..... संख्या में वस्त्रों को अपने शरीर पर धारण करूँगा , इससे अधिक वस्त्रों को नहीं पहनूंगा ।
*७. कुसुम :- पुष्प, तेल, इत्र, अगरबत्ती आदि सुगंधित पदार्थों का दैनिक मर्यादा रखना । ( 3, 5 ,7 आदि )
*८. वाहन :- रिक्शा, स्कूटर, कार, बस, ट्रेन आदि का दैनिक उपयोग या मर्यादा करें । ( 3, 5 ,7 आदि )
*९. शयन :- शय्या, आसन, कुर्सी, बिछोना, पलंग आदि का प्रमाण करना ( 5 ,10, 15 आदि )
*१०. विलेपन :- केसर, चन्दन, उबटन, साबुन, तेल, क्रीम, पाउडर आदि का प्रमाण करें । ( 3, 5 ,7 आदि )
*११. ब्रह्मचर्य :- परस्त्री का सर्वथा त्याग , स्वस्त्री के साथ मर्यादा का संकल्प करें ।
*१२. दिशा :- दश दिशाओ में अथवा एक दिशा में इतने कि. मी. से अधिक दूर जाने की सीमा निश्चित करना । (50 या 100 किलोमीटर )
*१३. स्नान :- श्रावक प्रतिदिन स्नान ना करे, अतः स्नान का त्याग, या पानी की मर्यादा करना)
*१४.भत्त नियम :- प्रतिदिन अन्न पानी आदि चारो आहारों का तोल/माप रखना । (रात्रिभोजन का त्यागकरना )
इन १४ नियमों को धरणेवाले
*प्रातः काल सूर्योदय और सांयकाल के समय शुद्ध भूमि पर बैठकर ३ नवकार गिनकर* निम्नलिखित पच्चक्खान लें ।
*देसावगासियं भोगपरिभोगं पच्चखामि अन्नथणाभोगेनं सहसागारेणं महत्तरागारेणं सव्वसमाहि वत्तियागारेणम् वोसिरामी ।*
इन १४ नियम के अतिरिक्त अन्य भी कुछ नियम है जो उपयोगी होने से उनका पालन करना जरुरी है ।
१. *पृथ्वीकाय* :- मिट्टी, नमक, पत्थर आदि जो खाने व किसी काम के उपयोग में आवे उनका प्रमाण करना।
२. *अप् काय* :- जो पानी स्नान करने, धोने, नहाने व पिने के काम में आवे उसका प्रमाण करना ।
३. *तेउकाय* :- चूल्हा, भटटी, चिराग, गैस, बिजली, स्वीच आदि का प्रमाण करना ।
४. *वायुकाय* :- झुला पंखा कूलर ए.सी. आदि वापरने की मर्यादा रखना ।
५. *वनस्पतिकाय*:-हरी वनस्पति वापरने का प्रमाण करना ।
६. *त्रसकाय* :- निरपराधी चलते फिरते जीवो को न मारने का नियम रखना , अनजाने में मर जाये तो मिच्छा मी दुक्क्डम देना आज तक हमने बहुत कर्म बंधन कर लिए
आज से हम १४ नियम आदि का पालन करके अनंत जीवों को अभयदान दे सकते हैं ।
*जब जागो तब सवेरा*
अभी इसी वक्त से श्रावक के १४ नियम लेने का संकल्प लेकर कर् निर्जरा की ओर अपना एक और कदम उठायें।
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सुपात्र दान (गोचरी) देने के लिये निम्न बातों का ध्यान रखना आवशयक है
सुपात्र दान GOCHARI गोचरी
🔺साधू-साध्वी जो अपने जीवन निर्वाह के लिए शुद्ध आहार--पानी ग्रहण करते है, उसे गोचरी कहते है। पंच महाव्रतधारी साधु-साध्वियों को श्रावक निर्दोष आहार--पानी बहरावें, उसे सुपात्र दान कहते है। सुपात्र दान देने से कर्मो की महान् निर्जरा होती है!
सुपात्र दान देने के लिये निम्न बातों का ध्यान रखना आवशयक है---
🔸असूझता व्यक्ति दरवाजा ना खोले यानि कच्चा पानी, हरी सब्जी या Electronics घड़ी,
मोबाइल आदि से संयुक्त हो, तो दरवाजा नहीं खोलना, बहराने के लिए भी आगे नहीं आना। घंटी नहीं बजाना, फूँक नहीं मारना, चुटकी-ताली नहीं बजाना।
🔸सात--आठ कदम सामने लेने जावे। सिर झुकाकर "मत्थेएण
वंदामि" बोले ।
🔸महाराज साहब को देखकर लाईट--पंखा, टी.वी. आदि को ऑन-ऑफ न करें, जैसे है वैसे ही रहने देवें ।
🔸कच्चा पानी, हरी वनस्पति, ऊग सके ऐसे बीज जैसे राई, सरसों, धनिया, कच्चा जीरा, कच्चा नमक आदि पदार्थो को तथा कच्चा सलाद, अंकुरित धान्य, फ्रिज, अग्नि से स्पर्श किये हुए पदार्थो को बहराने के लिये नहीं उठाएँ ।
🔸आहार-पानी के बाद औषध- भेषज, वस्त्र, पात्र अन्य कोई सेवाकार्य हो, तो पूछें। स्थानक में, धर्मस्थान में, गोचरी के लिए मेरे घर चलो ऐसा न कहें।
🔸अहो भाव पूर्वक बहरायें, मन में प्रसन्नता के भाव रखें तथा बोलें बड़ी कुपा की, बारम्बार हमें सेवा का मौका प्रदान करें। पदार्थ शुद्धि, पात्र शुद्धि और पश्चात् शुद्धि का ध्यान रखना विवेक है ।
🔸आस-पास के घर बतावें एवं गली तक पहुँचाने जावें! बहराते हुए अन्नादि से हाथ भर जाये, तो कच्चे पानी से नहीं धोना!
🔸गोचरी की यतना रखना या बैठकर बहराना!
🔸आहार पानी बहराते हुए घुटने के ऊपर से गिर जावे तो घर असुझता हो जाता है।
🔸निर्दोष आहार पानी बहराना चाहिए! साधु--साध्वियों के निमित्त आहार-पानी नहीं बनाना चाहिए।
🔸ऋषभदेव व महावीर ने पूर्वभवों में सुपात्र दान देकर धर्म का मूल समकित प्राप्त किया एवं कालांतर में तीर्थंकर बने।
🔸नेम--राजुल ने पूर्वभव में प्रासुक जल संतों को बहराया एवं महान् लाभ तीर्थंकर गौत्र बंध को प्राप्त किया!
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जैन तीर्थंकरों का परिचय
जैन तीर्थंकरों का परिचय
जैन धर्म के 24 तीर्थंकर है। इसमें से प्रथम तथा अंतिम चार तीर्थंकरों के बारे में बहुत कुछ पढ़ने को मिलता है किंतु उक्त के बीच के तीर्थंकरों के बारे में कम
ही जानकारी मिलती हैं। निश्चित ही जैन
शास्त्रों में इनके बारे में बहुत कुछ लिखा होगा, लेकिन आम जनता उनके बारे में कम ही जानती है।
यहाँ प्रस्तुत है 24 तीर्थंकरों का सामान्य परिचय।
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१) आदिनाथ :- प्रथम तीर्थंकर आदिनाथ को ऋषभनाथ भी कहा जाता है और हिंदू इन्हें वृषभनाथ कहते हैं। आपके पिता का नाम राजा नाभिराज था और माता का नाम मरुदेवी था। आपका जन्म चैत्र कृष्ण पक्ष की अष्टमी-नवमी को अयोध्या में हुआ। चैत्र
माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को आपने
दीक्षा ग्रहण की तथा फाल्गुन कृष्ण पक्ष
की अष्टमी के दिन आपको कैवल्य
की प्राप्ती हुई। कैलाश पर्वत क्षेत्र के अष्टपद में आपको माघ कृष्ण-१४ को निर्वाण प्राप्त हुआ।
जैन धर्मावलंबियों अनुसार आपका प्रतीक चिह्न- बैल, चैत्यवृक्ष- न्यग्रोध, यक्ष- गोवदनल,यक्षिणी-चक्रेश्वरी हैं।
२) अजीतनाथजी : द्वितीय तीर्थंकर
अजीतनाथजी की माता का नाम
विजया और पिता का नाम जितशत्रु था।आपका जन्म माघ शुक्ल पक्ष
की दशमी को अयोध्या में हुआ था। माघ शुक्ल पक्ष की नवमी को आपने दीक्षा ग्रहण की तथा पौष शुक्ल पक्ष
की एकादशी को आपको कैवल्य ज्ञान
की प्राप्ति हुई। चैत्र शुक्ल की पंचमी को आपको सम्मेद शिखर पर निर्वाण
प्राप्त हुआ। जैन धर्मावलंबियों अनुसार
उनका प्रतीक चिह्न- गज, चैत्यवृक्ष- सप्तपर्ण,यक्ष- महायक्ष, यक्षिणी- रोहिणी है।
३) सम्भवनाथजी : तृतीय तीर्थंकर
सम्भवनाथजी की माता का नाम सुसेना और पिता का नाम जितारी है।
सम्भवनाथजी का जन्म मार्गशीर्ष
की चतुर्दशी को श्रावस्ती में हुआ था।
मार्गशीर्ष के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा के दिन आपने दीक्षा ग्रहण की तथा कठोर तपस्या के बाद कार्तिक कृष्ण की पंचमी को आपको कैवल्य ज्ञान की प्राप्ति हुई। चैत्र शुक्ल पक्ष की पंचमी को सम्मेद शिखर पर आपको निर्वाण प्राप्त हुआ। जैन धर्मावलंबियों अनुसार उनका प्रतीक चिह्न- अश्व, चैत्यवृक्ष- शाल,
यक्ष- त्रिमुख, यक्षिणी- प्रज्ञप्ति।
४) अभिनंदनजी : चतुर्थ तीर्थंकर
अभिनंदनजी की माता का नाम
सिद्धार्था देवी और पिता का नाम सन्वर
(सम्वर या संवरा राज) है। आपका जन्म माघ शुक्ल की बारस को अयोध्या में हुआ। माघ शुक्ल
की बारस को ही आपने दीक्षा ग्रहण
की तथा कठोर तप के बाद पौष शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को आपको कैवल्य ज्ञान की प्राप्ति हुई। बैशाख शुक्ल
की छटमी या सप्तमी के दिन सम्मेद शिखर पर आपको निर्वाण प्राप्त हुआ। जैन धर्मावलंबियों अनुसार उनका प्रतीक चिह्न-बंदर, चैत्यवृक्ष- सरल, यक्ष- यक्षेश्वर, यक्षिणी-व्रजश्रृंखला है।
५) सुमतिनाथजी : पाँचवें तीर्थंकर
सुमतिनाथजी के पिता का नाम मेघरथ
या मेघप्रभ तथा माता का नाम सुमंगला था।बैशाख शुक्ल
की अष्टमी को साकेतपुरी (अयोध्या) में
आपका जन्म हुआ। कुछ विद्वानों अनुसार आपका जन्म चैत्र शुक्ल की एकादशी को हुआ था। बैशाख शुक्ल की नवमी के दिन आपने दीक्षा ग्रहण की तथा चैत्र शुक्ल पक्ष की एकादशी को आपको कैवल्य ज्ञान की प्राप्ति हुई। चैत्र शुक्ल की एकादशी को सम्मेद शिखर पर आपको निर्वाण प्राप्त हुआ। जैन
धर्मावलंबियों अनुसार उनका प्रतीक चिह्न- चकवा, चैत्यवृक्ष- प्रियंगु, यक्ष- तुम्बुरव,यक्षिणी- वज्रांकुशा है।
६) पद्ममप्रभुजी : छठवें तीर्थंकर पद्मप्रभुजी के पिता का नाम धरण राज और माता का नाम सुसीमा देवी था। कार्तिक कृष्ण पक्ष की द्वादशी को आपका जन्म वत्स कौशाम्बी में हुआ। कार्तिक कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को आपने दीक्षा ग्रहण की तथा चैत्र शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा के दिन आपको कैवल्य ज्ञान की प्राप्ति हुई। फाल्गुन कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को आपको सम्मेद शिखर
पर निर्वाण प्राप्त हुआ। जैन धर्मावलंबियों अनुसार उनका प्रतीक चिह्न-कमल, चैत्यवृक्ष- प्रियंगु, यक्ष-मातंग, यक्षिणी-अप्रति चक्रेश्वरी है।
७) सुपार्श्वनाथ : सातवें तीर्थंकर सुपार्श्वनाथ के पिता का नाम प्रतिस्थसेन तथा माता का नाम पृथ्वी देवी था।आपका जन्म वाराणसी में ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की बारस को हुआ था। ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष अंकी त्रयोदशी को आपने दीक्षा ग्रहण की तथा फाल्गुन कृष्ण पक्ष की सप्तमि आपको कैवल्य ज्ञान प्राप्त हुआ।फाल्गुन कृष्ण पक्ष की सप्तमी के दिन आपको सम्मेद शिखर पर निर्वाण प्राप्त हुआ। जैन धर्मावलंबियों अनुसार आपका प्रतीक चिह्न-स्वस्तिक,चैत्यवृक्ष- शिरीष, यक्ष- विजय, यक्षिणी- पुरुषदत्ता है।
८) चंद्रप्रभु : आठवें तीर्थंकर चंद्रप्रभु के
पिता का नाम राजा महासेन
तथा माता का नाम सुलक्षणा था।
आपका जन्म पौष कृष्ण पक्ष की बारस के दिन चंद्रपुरी में हुआ। पौष कृष्ण पक्ष
की त्रयोदशी को आपने दीक्षा ग्रहण
की तथा फाल्गुन कृष्ण पक्ष सात
को आपको कैवल्य ज्ञान की प्राप्ती हुई।
भाद्रपद के कृष्ण पक्ष की सप्तमी को आपको सम्मेद शिखर पर निर्वाण प्राप्त हुआ। जैन धर्मावलंबियों अनुसार आपका प्रतीक चिह्न-अर्द्धचंद्र, चैत्यवृक्ष- नागवृक्ष, यक्ष- अजित,यक्षिणी- मनोवेगा है।
९) सुविधिनाथ : नवें तीर्थंकर पुष्पदंत
को सुविधिनाथ भी कहा जाता है। आपके पिता का नाम राजा सुग्रीव राज
तथा माता का नाम रमा रानी था,
जो इक्ष्वाकू वंश से थी। मार्गशीर्ष के कृष्ण पक्ष की पंचमी को काकांदी में आपका जन्म हुआ।मार्गशीर्ष के कष्णपक्ष की छट (६) को आपने
दीक्षा ग्रहण की तथा कार्तिक कृष्ण पक्ष
की तृतीय (३) को आपको सम्मेद शिखर में कैवल्य की प्राप्ती हुई। भाद्र के शुक्ल पक्ष की नवमी को आपको सम्मेद शिखर पर निर्वाण प्राप्त हुआ। जैन धर्मावलंबियों अनुसार आपका प्रतीक चिह्न- मकर, चैत्यवृक्ष- अक्ष (बहेड़ा), यक्ष- ब्रह्मा, यक्षिणी- काली है।
१०) शीतलनाथ : दसवें तीर्थंकर शीतलनाथ के पिता का नाम दृढ़रथ (Dridharatha) और माता का नाम सुनंदा था। आपका जन्म माघ
कृष्ण पक्ष की द्वादशी (१२) को बद्धिलपुर(Baddhilpur) में हुआ। मघा कृष्ण पक्ष की द्वादशी को आपने दीक्षा ग्रहणकी तथा पौष कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी (१४)को आपको कैवल्य ज्ञान की प्राप्ती हुई।बैशाख के कृष्ण पक्ष की दूज को आपको सम्मेद
शिखर पर निर्वाण प्राप्त हुआ। जैन
धर्मावलंबियों अनुसार आपका प्रतीक चिह्न-कल्पतरु, चैत्यवृक्ष- धूलि (मालिवृक्ष), यक्ष-ब्रह्मेश्वर, यक्षिणी- ज्वालामालिनी है।
११) श्रेयांसनाथजी : ग्यारहवें तीर्थंकर
श्रेयांसनाथजी की माता का नाम
विष्णुश्री या वेणुश्री था और पिता का नाम विष्णुराज। सिंहपुरी नामक स्थान पर फागुन कृष्ण पक्ष की ग्यारस को आपका जन्म हुआ।श्रावण शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को सम्मेद शिखर
(शिखरजी) पर आपको निर्वाण प्राप्त हुआ। जैन धर्मावलंबियों अनुसार उनका प्रतीक चिह्न-गेंडा, चैत्यवृक्ष- पलाश, यक्ष- कुमार, यक्षिणी-महाकालीहै।
१२) वसुपूज्य : बारहवें तीर्थंकर वासुपूज्य प्रभु के पिता का नाम वसुपूज्य (Vasupujya) और
माता का नाम विजया था। आपका जन्म फाल्गुन कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी
को चंपापुरी में हुआ था। फाल्गुन कृष्ण पक्ष की अमावस्या को आपने दीक्षा ग्रहण की तथा मघा की दूज (२) को कैवल्य ज्ञान की प्राप्ती हुई। आषाड़ के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को चंपा में आपको निर्वाण प्राप्त हुआ। जैन धर्मावलंबियों अनुसार आपका प्रतीक चिह्न- भैंसा, चैत्यवृक्ष- तेंदू, यक्ष-
षणमुख, यक्षिणी- गौरी है।
१३) विमलनाथ : तेरहवें तीर्थंकर विमलनाथ के पिता का नाम कृतर्वेम (Kritaverma)तथामाता का नाम श्याम देवी (सुरम्य) था।आपका जन्म मघा शुक्ल तीज को कपिलपुर में हुआ
था। मघा शुक्ल पक्ष की तीज को ही आपने दीक्षा ग्रहण की तथा पौष शुक्ल पक्ष की षष्ठी के दिन कैवल्य की प्राप्ति हुई।आषाढ़ शुक्ल की सप्तमी के दिन श्री सम्मेद शिखर पर निर्वाण प्राप्त हुआ। जैन धर्मावलंबियों अनुसार आपका प्रतीक चिह्न-शूकर, चैत्यवृक्ष- पाटल, यक्ष- पाताल,यक्षिणी- गांधारी।
१४) अनंतनाथजी : चौदहवें तीर्थंकर
अनंतनाथजी की माता का नाम
सर्वयशा तथा पिता का नाम सिहसेन था।आपका जन्म अयोध्या में वैशाख कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी (१३) के दिन हुआ। वैशाख कृष्ण पक्ष चतुर्दशी (१४) को आपने दीक्षा ग्रहण की तथा कठोर तप के बाद वैशाख कृष्ण की त्रयोदशी के दिन ही कैवल्य ज्ञान की प्राप्ति हुई। चैत्र शुक्ल की पंचमी के दिन
आपको सम्मेद शिखर पर निर्वाण प्राप्त हआ। जैन धर्मावलंबियों अनुसार उनका प्रतीक चिह्न-सेही, चैत्यवृक्ष- पीपल, यक्ष- किन्नर, यक्षिणी-वैरोटी है।
१५) धर्मनाथ : पंद्रहवें तीर्थंकर श्री धर्मनाथ के पिता का नाम भानु और माता का नाम सुव्रत था। आपका जन्म मघा शुक्ल की तृतीया (३)को रत्नापुर में हुआ था। मघा शुक्ल की त्रयोदशी को आपने दीक्षा ग्रहण की तथा पौष की पूर्णिमा के दिन आपको कैवल्य की प्राप्ति हुई। ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष
की पंचमी को सम्मेद शिखर पर निर्वाण प्राप्त हुआ। जैन धर्मावलंबियों अनुसार आपका प्रतीक चिह्न- वज्र, चैत्यवृक्ष- दधिपर्ण, यक्ष- किंपुरुष,यक्षिणी- सोलसा।
१६) शांतिनाथ : जैन धर्म के सोलहवें तीर्थंकर शांतिनाथ का जन्म ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को हस्तिनापुर में इक्ष्वाकू कुल में
हुआ। शांतिनाथ के पिता हस्तिनापुर के
राजा विश्वसेन थे और माता का नाम
आर्या (अचीरा) था। आपने ज्येष्ठ माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को दीक्षा ग्रहण की तथा पौष शुक्ल पक्ष की नवमी के दिन आपको कैवल्य की प्राप्ति हुई। ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को सम्मेद शिखर पर
निर्वाण प्राप्त हुआ। जैन धर्मावलंबियों अनुसार आपका प्रतीक चिह्न-
हिरण, चैत्यवृक्ष-नंदी, यक्ष- गरुढ़, यक्षिणी-अनंतमतीहैं।
१७) कुंथुनाथजी : सत्रहवें तीर्थंकर
कुंथुनाथजी की माता का नाम
श्रीकांता देवी (श्रीदेवी) और
पिता का नाम राजा सूर्यसेन था। आपका जन्म वैशाख कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को हस्तिनापुर में
हुआ था। वैशाख कृष्ण पक्ष की पंचमी के दिन दीक्षा ग्रहण की तथा चैत्र शुक्ल पक्ष की पंचमी को कैवल्य ज्ञान की प्राप्ति हुई।वैशाख शुक्ल पक्ष की एकम के दिन सम्मेद शिखर पर निर्वाण प्राप्त हुआ। जैन धर्मावलंबियों अनुसार आपका प्रतीक चिह्न-छाग, चैत्यवृक्ष- तिलक, यक्ष- गंधर्व, यक्षिणी-मानसी है।
१८) अरहनाथजी : अठारहवें तीर्थंकर
अरहनाथजी या अर प्रभु के पिता का नाम सुदर्शन और माता का नाम मित्रसेन देवी था।
आपका जन्म मार्गशीर्ष के शुक्ल पक्ष
की दशमी के दिन हस्तिनापुर में हुआ।मार्गशीर्ष के शुक्ल पक्ष की ग्यारस को आपने दीक्षा ग्रहण की तथा कार्तिक कृष्ण पक्ष की बारस को कैवल्य ज्ञान की प्राप्ति हुई।मार्गशीर्ष की दशमी के दिन सम्मेद शिखर पर निर्वाण की प्राप्ति हुई। जैन धर्मावलंबियों अनुसार उनका प्रतीक चिह्न-तगरकुसुम (मत्स्य), चैत्यवृक्ष- आम्र, यक्ष- कुबेर,
यक्षिणी- महामानसी है।
१९) मल्लिनाथ : उन्नीसवें तीर्थंकर मल्लिनाथ के पिता का नाम कुंभराज और माता का नाम प्रभावती (रक्षिता) था। मार्गशीर्ष के शुक्ल पक्ष की ग्यारस को आपका जन्म मिथिला में हुआ था। मार्गशीर्ष के शुक्ल पक्ष की एकादशी को दीक्षा ग्रहण की तथा इसी माह की तिथि को कैवल्य की प्राप्ति भी हुई। फाल्गुन कृष्ण पक्ष की बारस को सम्मेद शिखर पर निर्वाण प्राप्त हुआ। जैन धर्मावलंबियों अनुसार आपका प्रतीक
चिह्न- कलश, चैत्यवृक्ष- कंकेली (अशोक), यक्ष-वरुण, यक्षिणी- जया है।
२०) मुनिसुव्रतनाथ : बीसवें तीर्थंकर
मुनिसुव्रतनाथ के पिता का नाम सुमित्र
तथा माता का नाम प्रभावती था।
आपका जन्म ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष की आठम को राजगढ़ में हुआ था। फाल्गुन कृष्ण पक्ष की बारस को आपने दीक्षा ग्रहण की तथा फाल्गुन कृष्ण पक्ष की बारस को ही कैवल्य ज्ञान की प्राप्ति हुई। ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष की नवमी को सम्मेद शिखर पर निर्वाण प्राप्त हुआ। जैन धर्मावलंबियों अनुसार आपका प्रतीक चिह्न-कूर्म, चैत्यवृक्ष- चंपक, यक्ष- भृकुटि, यक्षिणी-विजया।
२१) नमिनाथ : इक्कीसवें तीर्थंकर के
पिता का नाम विजय और माता का नाम सुभद्रा (सुभ्रदा-वप्र)था। आप स्वयं मिथिला के राजा थे। आपका जन्म इक्ष्वाकू कुल में श्रावण
मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को मिथिलापुरी में हुआ था।
आषाढ़ मास के शुक्ल की अष्टमी को आपने दीक्षा ग्रहण की तथा मार्गशीर्ष के शुक्ल पक्ष की एकादशी को कैवल्य की प्राप्ति हुई।वैशाख कृष्ण की दशमी को सम्मेद शिखर पर निर्वाण प्राप्त हुआ। जैन धर्मावलंबियों अनुसार आपका प्रतीक चिह्न-उत्पल, चैत्यवृक्ष- बकुल, यक्ष- गोमेध, यक्षिणी-अपराजिता।
२२) नेमिनाथ : बावीसवें तीर्थंकर नेमिनाथ के पिता का नाम राजा समुद्रविजय और माता का नाम शिवादेवी था। आपका जन्म श्रावण मास के कृष्ण पक्ष की पंचमी को शौरपुरी (मथुरा) में यादववंश में
हुआ था। शौरपुरी (मथुरा) के
यादववंशी राजा अंधकवृष्णी के ज्येष्ठ पुत्र समुद्रविजय के पुत्र थे नेमिनाथ। अंधकवृष्णी के सबसे छोटे पुत्र वासुदेव से उत्पन्न हुए भगवान श्रीकृष्ण। इस प्रकार नेमिनाथ और श्रीकृष्ण दोनों चचेरे भाई थे। श्रावण मास के कृष्ण पक्ष की षष्ठी को आपने दीक्षा ग्रहण
की तथा आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष
की अमावस्या को गिरनार पर्वत पर कैवल्य की प्राप्ति हुई। आषाढ़ शुक्ल
की अष्टमी को आपको उज्जैन या गिरनार पर निर्वाण प्राप्त हुआ। जैन
धर्मावलंबियों अनुसार आपका प्रतीक चिह्न-शंख, चैत्यवृक्ष- मेषश्रृंग, यक्ष- पार्श्व, यक्षिणी-बहुरूपिणी।
२३) पार्श्वनाथ : तेवीसवें तीर्थंकर पार्श्वनाथ के पिता का नाम राजा अश्वसेन तथा माता का नाम वामा था। आपका जन्म पौष कृष्ण पक्ष
की दशमी को वाराणसी (काशी) में हुआ था।चैत्र कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को आपने
दीक्षा ग्रहण की तथा चैत्र कृष्ण पक्ष
की चतुर्थी को ही कैवल्य की प्राप्ति हुई।
श्रावण शुक्ल की अष्टमी को सम्मेद शिखर पर निर्वाण प्राप्त हुआ। जैन
धर्मावलंबियों अनुसार आपका प्रतीक चिह्न-सर्प, चैत्यवृक्ष- धव, यक्ष- मातंग, यक्षिणी-कुष्माडी।
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२४) महावीर : चौबीसवें तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी का जन्म नाम वर्धमान,पिता का नाम सिद्धार्थ
तथा माता का नाम त्रिशला(प्रियंकारिनी) था। आपका जन्म
चैत्र शुक्ल की त्रयोदशी के दिन कुंडलपुर में हुआ था। मार्गशीर्ष कृष्ण पक्ष की दशमी को आपने दीक्षा ग्रहण की तथा वैशाख शुक्ल की दशमी के दिन कैवल्य की प्राप्ति हुई। ४२
वर्ष तक आपने साधक जीवन बिताया। कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की अमावस्या के दिन आपको पावापुरी पर ७२ वर्ष में निर्वाण प्राप्त हुआ। जैन धर्मावलंबियों अनुसार आपका प्रतीक
चिह्न- सिंह, चैत्यवृक्ष- शाल, यक्ष- गुह्मक, यक्षिणी- पद्मा सिद्धायिनी।
कुलकर, 63शलाका पुरुष तथा अन्य पूण्य पुरुष
🚩🚩*कुलकर, 63शलाका पुरुष तथा अन्य पूण्य पुरुष*🚩 🚩
त्रेसठ शलाका के पुरूष चतुर्थ काल में होते है ढाई द्वीप की 170 कर्मभूमियों में से 160 विदेह क्षेत्र में सदा चतुर्थ काल रहता है।पांच भरत पांच ऐरावत क्षेत्रों में प्रथम से छठे काल के क्रम से चतुर्थ काल आता है।
🚩🚩🚩🚩
चौदह कुलकारों के नाम
(1) श्री प्रतिश्रुति (2) श्री सन्मति (3) क्षेमंकर (4) सीमंकर (5) सीमंकर (6) सीमंधर (7) विमल वाहन (8) चक्षुमान (9) यशस्वी (10) अभिचन्द्र (11) चन्द्रप्रभ (12) मरूदेव (13) प्रसेनजित (14) नाभिराजा।***कुलकरों की पत्नियों के नाम ***
(1) स्वयंप्रभा (2) यशस्वी (3) सुनंदा (4) विमला (5) मनोहरी (6) यशोधरा (7) सुमति (8) धारिणी (9) कांतमाला (10) श्री मती (11) प्रभावती (12) सत्या (13) अभितमति (14) मरूदेवी
🚩🚩🚩🚩
*किसी कुलकर ने प्रजा के लिए क्या किया*
1 - पहले कुलकर ने सूर्य चन्द्रोदय से भय मिटाया।
2 - दूसरे कुलकर ने अंधकार तथा तारागण से भय मिटाया।
3 - तीसरे कुलकर ने हिंसक जन्तुओं की संगति त्याग करने का उपदेश दिया।
4 - चैथे कुलकर ने हिंसक जन्तुओं से रक्षण के उपाय बताये।
5 - पांचवे कुलकर ने कल्पवृक्ष की सीमायें बताई।
6 - छठवें कुलकर ने गुच्छादि चिन्हित सीमायें बताई।
7 - सातवें कुलकर ने हाथी आदि की सवारी का उपदेश दिया।
8 - आठवें कुलकर ने बालक के मुखदर्शन का उपदेश दिया।
9 - नौवें कुलकर ने बालक के नामकरण करने का उपदेश दिया।
10 - दसवें कुलकर ने शिशु रोदन निवारण चन्द्रादि दर्शन का उपदेश दिया।
11 - ग्यारवें कुलकर ने शीत आदि से रक्षा के उपाय बताये।
12 - बारहवें कुलकर ने नाव आदि द्वारा गमन करने का उपदेश दिया।
13 - तेरहवें कुलकर ने जरायुपटल को हटाने का उपदेश दिया।
14 - चौदहवें कुलकर ने नाभिनाल कर्तन का उपदेश दिया।
🚩🚩🚩🚩
तीसरा काल सुखमा-दुखमा नाम से आता है उसके समाप्त होने में जब पल्य का आठवा भाग शेष रह जाता है तब कुलकरों की उत्पत्ति प्रारम्भ होती है
कोई कुलकर मोक्ष नहीं जाते हैं।
क्योंकि कुलकर के समय में युगलिया जीव उत्पन्न होते हैं और विवाह पद्धति नहीं होती है। इसलिए कुलकर मोक्ष नहीं जाते हैं।
🚩🚩🚩🚩🚩
त्रेसठ शलाका पुरूष
24. तीर्थंकर, 12. चक्रवर्ती, 9 नारायण, 9 प्रतिनारायण, 9. बलभद्र ये शलाका के पुरूष होते हैं।
🚩🚩🚩🚩
**जम्बूद्वीप के भरत क्षेत्र के वर्तमान काल के
12 चक्रवर्तियों के नाम निम्न प्रकार हैं-
1 - भरत
2 - सगर
3 - मधवा
4 - सनत्कुमार
5 - शांतिनाथ
6 - कुंथुनाथ
7 - अरहनाथ
8 - सुभौम
9 - पद्म
10 - हरिषेण
11 - जय सेन
12 - ब्रह्मदत्त।
🚩🚩🚩🚩
*नारायण के नाम *
1. त्रिपृष्ठ 2. द्वयपृष्ठ 3. स्वयंभू 4. पुरूषोत्तम 5. पुरूष-सिंह 6. पुरूष 7. दत्त 8. नारायण 9. श्री कृष्ण।
🚩🚩🚩🚩
💦प्रतिनारायण💦
1. अश्वग्रीव 2. तारक 3. मेरक 4. मधुकैटभ 5. निसुम्भ 6. बलि 7. प्रहरण 8 रावण 9. जरासंघ।
🚩🚩🚩🚩
बारह चक्रवर्तियों में से हस्तिनापुर में पांच चक्रवर्ती हुए
हस्तिनापुर में हुए पांच चक्रवर्तियों के नाम सनत्कुमार, शांतिनाथ, कुंथुनाथ, अरहनाथ, एवं सुभौम चक्रवर्ती।
🚩🚩🚩🚩
सुभौम तथा ब्रहम्दत्त चक्रवर्ती सातवें नरक में गये हैं।
मधवा तथा सानत्कुमार चक्रवर्ती कल्पवासी स्वर्गों में गये है।
आठ चक्रवर्ती मोक्ष गये है।
भरत, सगर, शांतिनाथ, कुंथुनाथ, अरहनाथ, पद्म, हरिषेण व जयसेन ये चक्रवर्ती मोक्ष गये हैं।
🚩🚩🚩🚩
सगर चक्रवर्ती के साठ हजार पुत्र थे
सगर चक्रवर्ती के साठ हजार पुत्र एक साथ जल गये थे,मुनि निंदा कर कर्म उदय में आ जाने के कारण से।
🚩🚩🚩🚩
ढाई द्वीपों में 170 कर्मभूमियों में 63 शलाका के पुरूष होते हैं। अतः उनकी संख्या 63 गुण 170 = 10710 पुरूष।
पांच भरत, पांच ऐरावत क्षेत्रों में तृतीय काल के अंत में कुलकर होते हैं।
🚩🚩🚩🚩
जम्बूद्वीप, धातकी खंड तथा पुरकरवर द्वीप के हेमवत तथा हैरणयवत क्षेत्रों में तृतीय काल रहता है वहां काल परिर्वतन नही होते है इस लिए कुलकर नहीं होते हैं
नारायण का दूसरे नाम विष्णु है।
प्रतिनारायण को प्रतिविष्णु भी कहते है तथा इन्हें त्रिखंडी भी कहते हैं।
💦**प्रतिनारायण**💦
जो कर्मभूमि के विजयार्ध के नीचे के तीन खंडों- 1. आर्यखंड, 2. मलेच्छ खंडों को जीतते हैं वे त्रिखंडी, प्रतिनारायण या प्रतिविष्णु कहलाते हैं।
💦***नारायण***💦
जो त्रिखंडी प्रतिनारायण को जीतते हैं तथा प्रतिनारायण के चक्र से उनहीं को मार देते हैं वे नारायण या विष्णु कहलाते हैं।
🚩🚩🚩🚩
💦नारायण व प्रतिनाराण का नियोग💦
पहले, प्रतिनारायण अपने चक्र रत्न से तीनों खंडो को जीतता है। पुनः नारायण से उसका युद्ध होता है, युद्ध में प्रतिनारायण के ऊपर अपना चक्र चलाते हैं, वह चक्र नारायण की परिक्रमा करनके उनके हाथ में आ जाते हैं। उसी चक्ररत्न को नारायण प्रतिनारायण के ऊपर चला देते हैं। जिससे प्रतिनारायण का घात हो जाता है तथा प्रतिनारायण मर कर नरक में चले जाते हैं।
नारायण मर कर नरक में उत्पन्न होते हैं।
श्री मुनिसुव्रत भगवान के शासन काल में रावण नाम के प्रतिनारायण एवं लक्ष्मण नाम के नारायण हुए थे। रावण का वध लक्ष्मण किया था
श्री नेमिनाथ भगवान के शासन काल में श्री कृष्ण नाम के नारायण, जरासंघ नाम के प्रतिनारायण हुए हैं।
🚩🚩🚩🚩
💦**बलभद्र **💦
नारायण के बड़े भाई बलभद्र होते हैं।
जैसे राम बलभद्र उनके भाई लक्ष्मण नारायण
बलभद्र मोक्ष और स्वर्ग में जाते हैं।
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💦नौ बलभद्रों के नाम 💦
1. चितय 2. अचल, 3. धर्म 4. सुप्रभ 5. सुदर्शन 6. नंदी, 7. नदिंमित्र 8. राम और
9. बलभद्र।
श्री मुनिसुव्रत नाथ भगवान एवं नेमिनाथ तीर्थंकर के शासन काल में राम एवं पद्म से बलभद्र हुए हैं
🚩🚩🚩🚩
💦***रूद्र***💦
रूद्र ग्यारह होते हैं उनके नाम
1 - भीमावली
2 - जितशत्रु
3 - रूद्र
4 - वैश्रवानर
5 - सुप्रतिष्ठ
6 - अचल
7 - पुंडरीक
8 - अजितधर
9 - अजितनाभि
10 - पीठ
11 - सात्यिक पुत्र
🚩🚩🚩🚩
कौन से रूद्र, कौन से तीर्थंकर के काल में हुए
तीर्थंकर ,रूद्र
श्री आदिनाथ जी - भीमावली
श्री अजितनाथ जी - जितशत्रु
श्री पुष्पदंत जी - रूद्र
श्री शीतल नाथ जी - वैश्रवानर
श्री श्रेयांसनाथ जी - सुप्रतिष्ठ
श्री वासुपूज्य जी - अचल
श्री विमलानाथ जी - पुंडरीक
श्री अनंतनाथ जी - अजितधर
श्री धर्मनाथ जी - अजितनाभि
श्री शांतिनाथ जी - पीठ
श्री महावीर जी - सात्यिकी पुत्र
सब रूद्र दसवें पूर्व का अध्ययन करते समय विषयों के निमित्त से तप से भ्रष्ट होकर मिथ्यात्व को धारण करते हुए नरकों में चले जाते हैं।
🚩🚩🚩🚩
💦***नारद ***💦
नारद नौ होते हैं।नौ नारदों के नाम
1. भीम 2. महाभीम 3. रूद्र 4. महारूद्र 5. काल 6. महाकाल 7. दुर्मुख 8. नरमुख 9. अधोमुख
सभी नारद अति रूद्र होते हुए दूसरों को रूलाया करते हैं, वे पाप के निधान कलह प्रिय युद्ध प्रिय होने से नकर जाते हैं।
🚩🚩🚩🚩
💦***कामदेव***💦
उस समय के मुनष्यों में जो सबसे सुन्दर आकृति के धारक होते हैं। वे कामदेव कहलाते हैं।
🚩🚩🚩🚩
💦*कामदेव चौबीस होते हैं,कामदेवों के नाम*💦
1. श्री बाहुबली 2. अमित तेज 3. श्री धर 4 यशोभ्रद्र 5. प्रसेनजित 6 चन्द्रवर्ण 7. अग्निमुक्त 8 सनत्कुमार 9 वत्सराज 10 कनकप्रभ 11 सिद्धवर्ण 12 शांतिनाथ 13 कुंथुनाथ 14 अरहनाथ 15 विजयराज 16 श्रीचन्द 17 राजानल 18 हनुमान 19 बलगंज 20 वसुदेव 21 प्रद्युम्न 22 नागकुमार 23 श्रीपाल 24 जम्बूस्वामी।
🚩🚩🚩🚩
महापुरूषों के मोक्ष जाने के विषय मे नियम हैं
तीर्थंकर, उनके माता-पिता, चक्रवर्ती, बलदेव, नारायण, रूद्र, नारद, कामदेव, कुलकर ये सभी भव्य होते हुए नियम से सिद्ध होते है तीर्थंकर तो उसी भव से सिद्ध होते हैं। अन्यों के लिए उसी भव का नियम नहीं हैं।
🚩🚩🚩🚩
💦महापुरूष कुल निम्न हैं💦
तीर्थंकर - 24,तीर्थंकर की माता - 24,तीर्थंकर की पिता - 24,चक्रवर्ती - 12,बलदेव - 9,
नारायण - 9,प्रतिनारायण - 9,
रूद्र - 11,नारद - 9,कामदेव - 24,कुलकर - 24 ,169 कुल है........
Nav pad oliji vishesh lekh नव पद ओलिजी नमो सिद्धाणं
नवपद ओलीजी का दूसरा दिन
*सिद्ध पद की आराधना का दिन*
9 पदों में किसी भी व्यक्ति विशेष को वंदना नही की गयी है।जो जो आत्मा उन उन महान गुणों तक पहुँचे है उन सभी गुणीजनों को एक साथ वंदना की गयी है।।।नमो सिद्धाणं।।
सिद्ध प्रभु का परिचयजिन आत्माओ ने खुद के ऊपर लगे हुए सभी कर्मों का क्षय कर दिया हो। जो संसार के बंधन से मुक्त हो गए है। जो कभी जन्म नही लेंगे। जिनकी कभी मृत्यु नही होगी, जिनका कोई शरीर, मन नही है।उन पवित्र आत्माओं को सिद्ध कहा जाता है।
जिनके सभी काम सिद्ध हो गए है। सिद्ध यानि अपना खुद का स्वरुप प्राप्त करना।सिद्ध पद को प्राप्त करना ही आज के हर भव्य जीव का लक्ष्य है।अरिहंत प्रभु के कुछ कर्म क्षय होना बाकी होता है।आयुष्य का बंधन भी होता है।जबकि सिद्ध प्रभु की कोई बंधन नही होता है।सिद्ध प्रभु के साथ जो आत्मा अपना मन लगा देता है उसका मोक्ष निश्चित हो जाता है।सभी बंधन से रहितसभी सिद्धि को प्राप्त14 राजलोक के मुकुट समान भाग पर रहे हुए है।सामान्य भाषा में कहे तो अपने ऊपर छत्र के समान वो बिराजित है।हमारी आराधना,तपस्या , साधनाआदि का 1 ही लक्ष्य होना चाहिए किमै सिद्ध पद को प्राप्त करूँ।बिना लक्ष्य के कोई भी आराधना सिद्ध पद को प्राप्त नही करा सकती।बिना लक्ष्य की आराधना से पूण्य होगादेवगति मिल सकती हैपर मोक्ष नही मिलता है।मोक्ष में जाकर कुछ करना नही होता।कुछ भी कार्य करना वहां जरुरी है जहा अपूर्णता है।मोक्ष में कोई अपूर्णता नही होतीसंसार में अपना आयुष्य पूरा हुआ कि चलो।मोक्ष में आयुष्य ही नही है।शास्वत काल को स्थिरता वहा होती हैसामान्य नियम-जब कभी इस संसार सागर से 1 आत्मा सिद्ध गति में जाती है तब 1 आत्मा अव्यवहार राशि से निकल कर व्यवहार राशि में आती है।हम भी तभी व्यवहार राशि में आये है जब कोई आत्मा सिद्ध गति में गयी थी।इस लिए उन सिद्ध परमात्मा का हमारे ऊपर बोहत बड़ा उपकार है।ऐसे अनंत उपकारी सिद्ध प्रभु को ह्रदय से वंदनावो ही हमारे आदर्श है।वो ही हमारे तारक है।वो ही हमारे श्रद्धेय है।वो ही हमारे आराध्य है।उनसे ही मेरा नाता है।सच्चा नाता है।अटूट नाता है।उन सिद्ध जीवों ने अपने आठ कर्मो का क्षय किया है।वो ही कार्य मुझे भी करना है।किसी कवि की कल्पना-अरिहंत सिद्ध प्रभु हमसे कहते है -जिस करणी से हम भयेअरिहंत सिद्ध भगवान्।वो ही करनी तू करोहम तुम एक सामानउन सिद्ध प्रभु के 8 गन होते है-वो आठ गुण आठ कर्मो के क्षय से प्रकट होते है
#1 कर्म ज्ञानावरणीय ।उसके क्षय सेअनंत ज्ञान यह गुण प्राप्त होता है।जिस ज्ञान से आत्मा सभी जीवपुद्गल परमाणुसभी पर्यायसभी कालको 1 ही समय में देख सकते है।उनसे छिपा हुआ जगत में कोई कार्य नही होता
#2 कर्म दर्शनावरणीय ।उसके क्षय से अनंत दर्शनयह गुण आत्मा में प्रकट होता हैजो आत्मा का सहज गुण है।जिससे हम सभी पदार्थों का सामान्य ज्ञान प्राप्त करते है।
#3 कर्म वेदनीय।उसके क्षय से आत्मा में अव्याबाध सुखयह गुण प्रकट होता है।प्रकट होना मतलब -सभी गुण आत्मा में उपस्थित है।उन गुणों पर कर्मों का पर्दा आ गया है।जैसे ही वह पर्दा हटता है-क्षय होता है।उसी समय गुण आत्मा में पूर्ण रूप से प्रकट ही जाता है।अव्याबाध सुख से अनंत काल तक उन्हें कोई पीड़ा नही होगी।हम संसार में कितनी साड़ी पीड़ाओं को सहन कर रहे है।
#4 कर्म मोहनीय।उसके क्षय से आतमा में अनंत चारित्र यह गुण प्रकट होता है।जैसे संसार में जीव मिठाई को खाकर खुश होता हैवैसे ही उससे भी ज्यादा सुख की अनुभूति सहजानंद अवस्था में सिद्ध के जीवों को होती है।
#5 कर्म आयुष्य।
उसके क्षय से आत्मा में अक्षय स्थिति ये गुण प्रकट होता हैजिससे जन्म मृत्युबुढ़ापा आदि सभी दुखदायी अवस्था का नाश हो जाता है।संसार में आयुष्य पूरा होते ही निकलना पड़ता है।आयुष्य पूरा होने का भी इन्तजार किया जाता है।मोक्ष में कोई आयुष्य नही है।जिससे वहां कोई दुःख नही है।
#6 नाम कर्म ।
उसके क्षय से अरुपी गुण प्रकट होता है।संसार में शरीर के कारण कोई सुंदर,कोई भद्दा हो सकता है।मगर सिद्ध गति में शरीर ही नही होता।वो उनकी आत्मा निजानंद में रमण करता है।
#7 कर्म गोत्र कर्म।
उसके क्षय से आत्मा में अगुरुलघु गुण प्रकट होता हैजिससे सिद्ध गति में सभी जीव समान हो जाते है।संसार कोई बड़ा कोई छोटाकोई खानदानीकोई फुटपाथी।सिद्ध पद सभी आत्मा को एक समान बना देता है
#8 कर्म अंतराय
उसके क्षय से आत्मा में अनंतवीर्य गुण प्रकट होता है।जिसके द्वारा जगत के सभी जीवो को अभयदान दिया जाता है।संसार मेंभोग उपभोग दान लाभआदि सभी कार्य में अंतराय कर्म बाधा बनता है।सिद्ध प्रभु उस कर्म को नष्ट कर देते हैजिससे उन्हें कोई बाधा नही रहती।
ऐसे घाती और अघाती कर्मो का क्षय करने वाले14 राजलोक के अग्र भाग में स्थित स्फटिक की तरह निर्मल है आत्मा जिनकी ऐसे महा उपकारी सिद्ध प्रभु को हमारे शरीर के हर रोम रोम से खून के हर कण कण सेनमन।।।वंदन।।।*परमात्मा की आज्ञा के विरुद्ध कुछ कहा हो तो मिच्छामि दुक्कडं।।*
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