advertisement

Dhanya Dhanya wo Kshan kab aaye || धन्य-धन्य वो क्षण कब आए

 Dhanya Dhanya wo Kshan kab aaye || धन्य-धन्य वो क्षण कब आए

धन्य-धन्य वो क्षण कब आए

जब भीतर में वैराग्य आए

इस जग में जहाँ भी देखूँ

धूँ-धूँ जलता नज़र मुझको आए


नरकों में देव देते थे जब वेदना

छोड़ दो-छोड़ दो करते थे याचना

फिर भी बेरहमी से हमको दी यातना

कितनी पीड़ा हुई कितना था भोगना

खुद से पूछा यहाँ क्यों आए

क्या किया पहले जो दु:ख पाए

धन्य-धन्य…


पेट भरने को दर-दर पे जाकर खड़ा

मैं जिऊँ या मरूँ किसको क्या था पड़ा

बेजुबाँ मुझपे लाखों थे जुल्म हुए

खून के आसूँ थे फिर भी सख्त हुए

जब थे तिर्यंच दु:ख गहराएँ

मेरे कर्मों की ही थी सजाएँ

धन्य-धन्य…

गर्भ के दु:ख को हम आज भूले हुए

कोख की गंदगी में थे सिकुड़े हुए

अपना दु:ख अपनी माँ भी समझ ना सकी

दर्द अपनी जुबाँ ना बयां कर सकी

थोड़ी दुर्गंध भी ना सुहाए

कैसे नौ मास हमने बिताए

धन्य-धन्य…


एक पल भी न कष्टों से मुक्ति मिली

एक भी साँस राहत की हमने ना ली

ज्ञान ऐसा मिले जानूँ अपनी दशा

घोर कष्टों के क्षण कैसी थी दुर्दशा

देखकर आत्मा रो जाए

सोचो कैसे सहा क्या बताएं

धन्य-धन्य…


अब तक माता-पिता तव अनन्ता हुए

कौन है साथ तेरे जो तेरे हुए

फिर भी इस भव में रिश्तों से इतना जुड़ा

एक क्षण का विरह भी सहन न हुआ

किससे बाकी, जो रिश्ते बनाए

प्रेम किसके लिए तू लुटाए

धन्य-धन्य…


कस्तूरी के लिए मृग तड़पता रहे

ढूँढे सारा जहाँ मूढ़ बनकर अरे!

हम अनादि से ऐसे ही हैं घूमते

सुख जो बाहर नहीं फिर भी हम खोजते

भोगों से ही अगर सुख आए

क्यों प्रभु इनको ठुकरा के जाएं

धन्य-धन्य…


देवों को विषयों की क्या कोई है कमी

फिर क्यों संयम पे इनकी है दृष्टि थमी

देव पछताएँ संयम नहीं ले सकूँ

शक्ति है फिर भी पालन नहीं कर सकूँ

अन्तर्मन से ये भाव हैं भाएँ

अगले भव हम भी संयम पाएँ

धन्य-धन्य…


घोर संसार वन का नहीं छोर है

इस घने वन में सुख की नहीं भोर है

प्यास सुख की हमारी तो जन्मों की है

मृगतृष्णा-सा सुख भ्रम अनादि से है

भव-भव की जो प्यास मिटाए

सुख का झरना वो सिद्धों में पाए

धन्य-धन्य…

Comments

Advertisement

Popular posts from this blog

ADVERTISEMENT