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प्रभु महावीर का दीक्षा कल्याणक
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🙇♂️ परमतारक प्रभु महावीर का दीक्षा कल्याणक - कार्तिक वद 10
•- प्रभु के माता पिता के स्वर्गवास के बाद 28 वर्ष की यौवन वय में प्रभु ने दीक्षा ग्रहण करने की तैयारी की , किंतु बड़े भाई राजा नंदिवर्धन के आग्रह से वे राजमहल में भी साधु की तरह अनासक्त भाव से दो साल तक रहें ।🙇🏻♂️
•- दीक्षा का समय होते ही नव लोकांतिक देवों ने आकर प्रभु को इस प्रकार से विनंती की , *" जय-जय नंदा ! जय-जय भद्दा ! जय जय खत्तिवर वसहा !* हे परमतारक प्रभु ! आपकी जय हो ! विजय हो ! हे क्षत्रिय में श्रेष्ठ ऋषभ समान प्रभु आपकी जय हो ! हे तीन लोक के नाथ ! संयमधर्म स्वीकारो ! कर्म क्षय करके केवलज्ञान प्राप्त करो ! विश्व के सर्व जीवों के हितकारी धर्म तीर्थ की स्थापना करो !"👏
•- उसके बाद प्रभु ने 1 साल तक वर्षीदान दिया *कार्तिक वद 10* के दिन चंद्रप्रभा नामक शिबिका में बैठकर भव्य वरघोड़े के साथ दीक्षा लेने के लिए प्रभु ज्ञातखंड उद्यान में पधारे। 🌳🌳
•- उद्यान में आने के बाद प्रभु ने स्वयं अपने सभी आभूषणों को दूर किये । पंचमुष्ठि लोच किया । सर्व पाप कर्मों को त्यागकर *' नमो सिद्धाणं '* पद बोलकर प्रभु ने दीक्षा ग्रहण की । उसी समय प्रभु को चौथा मनःपर्यव ज्ञान प्राप्त हुआ ।🙏
•- दीक्षा लेने के बाद *प्रभु ने घोर उपसर्ग और परिषहों को सहन किया ।* साढ़े बारह साल में प्रभु ने कभी निद्रा नहीं ली । सदा मौन रहे । साढ़े बारह सालों में प्रभु कभी भी बैठे तक नहीं किंतु दिन-रात सतत काऊसग्ग ध्यान में ही रहे । साढ़े बारह सालों में प्रभु ने कुल 4161 उपवास की तपश्चर्या की जबकि पारणे के दिन सिर्फ 349 ही थे ।🙇🏻♂️
धन्य धन्य महासंयमी महावीर...
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